फिल्म मेकिंग में क्रिएटिविटी के साथ करियर की संभावना, इस क्षेत्र में बढ़ रहा है युवाओं का रुझान
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 02 Aug 2018 12:26 AM
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रांची : हम में से कई लोग ऐसे होते हैं, जो जीवन में करियर की परंपरागत सेक्टर से परे हट कर कुछ क्रिएटिविटी करते रहते हैं. इसमें पेंटिंग, डांस, आर्ट एंड क्राफ्ट मेकिंग आदि शामिल हैं. इन्हीं क्रिएटिविटी से भरे सेक्टर का एक हिस्सा फिल्म मेकिंग का होता है. हाल के वर्षों में इस सेक्टर […]
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रांची : हम में से कई लोग ऐसे होते हैं, जो जीवन में करियर की परंपरागत सेक्टर से परे हट कर कुछ क्रिएटिविटी करते रहते हैं. इसमें पेंटिंग, डांस, आर्ट एंड क्राफ्ट मेकिंग आदि शामिल हैं. इन्हीं क्रिएटिविटी से भरे सेक्टर का एक हिस्सा फिल्म मेकिंग का होता है. हाल के वर्षों में इस सेक्टर ने काफी ग्रोथ किया है. इस सेक्टर को लेकर युवाओं का रुझान भी काफी बढ़ा है.
मोटे तौर पर फिल्म मेकिंग का मतलब लोग डायरेक्टर, एक्टर आदि ही समझते हैं. पर एक फिल्म बनाने में दो दर्जन से अधिक लोगों का योगदान होता है, जो फिल्म मेकिंग के विभिन्न पहलुओं में महारत रखते हैं. इस तरह से फिल्म मेकिंग का सेक्टर काफी बड़ा हो जाता है. इससे संभावनाएं भी काफी बढ़ी हैं. इस रिपोर्ट के जरिये जानते हैं फिल्म मेकिंग के क्षेत्र में संभावनाओं के बारे में…
क्या होता है फिल्म मेकिंग
फिल्म मेकिंग एक कला है, जिसके लिए एक बेहतर कैमरे की जरूरत होती है. फिल्म मेकिंग में स्क्रिप्ट यानी कहानी के आधार पर काम किया जाता है. इसमें चरित्र होते हैं. एक कहानी होती है. हर कहानी की एक भाषा होती है. फिल्म दृश्य होते हैं, ध्वनियों का दृश्यों के साथ मिलान होता है.
स्पेशल इफेक्ट होते हैं और साथ ही साथ गीत संगीत होता है. फिल्मों में क्रिएटिविटी और टेक्नोलॉजी का अनोखा मेल देखा जाता है. आज फिल्मों में नयी-नयी तकनीकों का प्रयोग किया जा रहा है. हर एक फिल्म को रिलीज होने से पहले उसे सेंसर बोर्ड के सामने परखा जाता है. वहां से पास होने के बाद ही उसे आम जनता के लिए रिलीज किया जाता है.
आवश्यक योग्यता
फिल्म मेकिंग को बेहतर तरीके से बताने के लिए आज कई पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स उपलब्ध हैं. बैचलर स्तर पर भी अलग-अलग संस्थान कोर्स कराते हैं. बैचलर कोर्स में दाखिला लेने के लिए न्यूनतम योग्यता 12वीं पास है, जबकि पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स के लिए न्यूनतम 40 फीसदी अंक के साथ ग्रेजुएट होना जरूरी है. साउंड एडिटिंग और कुछ अन्य तकनीकी कोर्स में नामांकन के लिए साइंस बैकग्राउंड का होना जरूरी है.
अनुभव से बढ़ती है आय
फिल्म मेकिंग के किसी भी सेग्मेंट में काम की शुरुआत में कमाई औसत ही होती है. यह आपके काम की बारीकी व अनुभव के साथ बढ़ती जाती है. शुरुआती दौर में 20 से 25 हजार रुपये प्रतिमाह मिल जाते हैं.
अवसरों की है भरमार
फिल्म मेकिंग का कोर्स करने के बाद आपके पास करियर बनाने को लेकर ढेरों विकल्प होते हैं. इसमें स्क्रिनप्ले, निर्देशन, सिनेमेटोग्राफी, संगीत, कोरियोग्राफी व वीडियोग्राफी प्रमुख है.
स्क्रिनप्ले : स्क्रीनप्ले आइडिया और कहानी के बाद का महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसके आधार पर ही फिल्म को शूट किया जाता है. स्क्रिप्ट राइटर की मदद से कहानी की पटकथा तैयार की जाती है. दरअसल पटकथा एक नहीं, अनेक हो सकती है, जिसमें कैमरामैन और अभिनेताओं समेत सभी जरूरी लोगों को के लिए आवश्यकता के अनुसार पटकथाएं तैयार की जाती हैं. पटकथा में समय, लोकेशन और सिचुएशन की सूचना अंग्रेजी में लिखी जाती है.
निर्देशन : फिल्मों में निर्देशन करना एक मल्टीटास्किंग काम है. फिल्म की पटकथा से लेकर संवादों की प्रस्तुति और कैमरे के संयोजन तक का काम एक निर्देशक को करना होता है. बॉलीवुड में पटकथा लेखन, संवाद लेखन और निर्देशन एक व्यक्ति द्वारा ही करने का चलन है.
सिनेमेटोग्राफी : फिल्म के शॉट से जुड़ा हुआ काम सिनेमेटोग्राफी का होता है. सिनेमेटोग्राफी में मौलिक रूप से तीन शॉट और दो मूवमेंट होते हैं. शॉट क्लॉज अप, मिड और लांग होता है, जबकि मूवमेंट पैन और टिल्ट होते हैं. इसे शॉट और मूवमेंट फिल्म का व्याकरण कहा जाता है.
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