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रांची नगर निकाय चुनाव : ये हैं मुन्नी भइया, कभी नहीं जीते, लेकिन नहीं मानेंगे हार

Updated at : 10 Apr 2018 7:21 AM (IST)
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रांची नगर निकाय चुनाव : ये हैं मुन्नी भइया, कभी नहीं जीते, लेकिन नहीं मानेंगे हार

II पूजा सिंह II इस बार भी हैं मैदान में रांची : अमरेंद्र कुमार उर्फ मुन्नी़ राजधानी के लोग इनको मुन्नी भइया के नाम से जानते है़ं इस बार निकाय चुनाव में रांची से डिप्टी मेयर के उम्मीदवार है़ं खास यह नहीं है कि वह डिप्टी मेयर के तौर पर भाग्य अाजमा रहे है़ं खास […]

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II पूजा सिंह II
इस बार भी हैं मैदान में
रांची : अमरेंद्र कुमार उर्फ मुन्नी़ राजधानी के लोग इनको मुन्नी भइया के नाम से जानते है़ं इस बार निकाय चुनाव में रांची से डिप्टी मेयर के उम्मीदवार है़ं खास यह नहीं है कि वह डिप्टी मेयर के तौर पर भाग्य अाजमा रहे है़ं खास यह है कि चुनाव इनके लिए पैशन है़ पिछले 32 वर्षों से चुनाव लड़ रहे है़ं
विधायक से लेकर वार्ड पार्षद तक का चुनाव लड़ा है, लेकिन दुर्भाग्यवश किसी में सफलता नहीं मिली. 1986 से इनका चुनावी सफर शुरू हुआ है़ पहली बार वार्ड पार्षद का चुनाव लड़े़ छह सौ वोट मिले और हार गये़ 2008 में भी डिप्टी मेयर के लिए चुनाव लड़ चुके है़ं हटिया से विधायक का भी चुनाव तीन बार लड़ चुके है़ं हर बार शिकस्त मिली, लेकिन मुन्नी भइया हार नहीं मानने वाले़ अब तक छह बार चुनाव लड़ चुके है़ं इनको भरोसा है कि जनता एक बार जरूर मौका देगी. क्योंकि इनका मानना है कि देर है, लेकिन अंधेर नही़ं
1977 से सक्रिय हैं राजनीति में
बात करें राजनीतिक पहचान कि तो मुन्नी भइया 1977 से राजनीति में सक्रिय है़ं पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत के भी नजदीक रहे है़ं इसके बाद हटिया विधानसभा का 20 साल तक इंचार्ज रहे़ 14 साल जेडीयू रांची महानगर के अध्यक्ष पद पर काबिज रहे़ वर्तमान में झारखंड जन क्रांति मोर्चा के केंद्रीय अध्यक्ष है़ं इस दौरान 1986 में वार्ड 25 से नगर निगम में पार्षद के लिए चुनाव लड़े. छह सौ वोट मिले.
इसके बाद विधायक बनने की मुराद लेकर 1990 से 2000 तक लगातार तीन बार हटिया विधानसभा से चुनाव लड़े, लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया़ अंतिम समय में सारे वोट अन्य नेता को मिल गये़ इनको करीब 1000-1500 वोट मिले. 2008 में नगर निकाय चुनाव में डिप्टी मेयर पद के लिए चुनाव लड़ा, उसमें 2700 वोट मिले़
भाई, चाचा के बाद बेटी बनी है सहारा : मुन्नी बताते हैं कि अब तक जितनी बार भी चुनाव लड़े हैं, अपने दम पर लड़े है़ं इसका सारा खर्च खुद करते है़ं चुनाव के लिए भाई, चाचा से लेकर कई लोगों से मदद ली़
इस बार के चुनाव का खर्च बेटी उठा रही है़ वह पुणे से अपनी सैलरी का पैसा भेज रही है़ इनका कहना है कि जब तक सांस है तब तक चुनाव लड़ते रहेंगे़, क्योंकि इस देश को भ्रष्टाचार मुक्त कराना है़ राजनीति में कैसे सुधार होगा, इसके लिए ऋषिकेश में ट्रेनिंग भी ली़ चुनाव लड़ने का उद्देश्य भ्रष्टाचार को खत्म करना है़
लिबास से लेकर चप्पल तक की सफेदी इनकी पहचान : इनकी पहचान सफेद लिबास है़
पिछले 41 वर्ष से सफेद कपड़ा ही पहनते है़ं चप्पल तक सफेद है़ मुन्नी कहते हैं कि सफेद लिबास पहनने से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है़ आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा मिलती है़ 1977 में झूठे मामले में थाना जाना पड़ा था़ थाना से बाहर आते ही मैंने संकल्प लिया कि जब तक सांस चलेगी, सफेद लिबास में ही रहूंगा. यह मुझे राह भटकने नहीं देती.
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