पलामू में फसल बीमा में गड़बड़झाला, 2.26 लाख से अधिक आवेदन फर्जी

पलामू में फसल बीमा घोटाला
Crop Insurance Scam: झारखंड के पलामू में बिरसा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत बड़ा गड़बड़झाला सामने आया है. जांच में 3.10 लाख आवेदनों में से 2.26 लाख से अधिक आवेदन फर्जी पाए गए हैं. आच्छादित भूमि से तीन गुना अधिक क्षेत्र का बीमा किया गया. प्रशासन ने जांच के बाद कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की है. नीचे पूरी खबर पढ़ें.
पलामू से शिवेंद्र कुमार की रिपोर्ट
Crop Insurance Scam: झारखंड सरकार के निर्देश पर बिरसा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत पलामू जिले में खरीफ फसल का बीमा कराया गया था. इस योजना का संचालन एचडीएफसी एर्गो बीमा कंपनी द्वारा किया जा रहा था. लेकिन, समीक्षा के दौरान फसल बीमा में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी सामने आई है. जांच में खुलासा हुआ है कि 2 लाख 26 हजार 601 आवेदन पूरी तरह फर्जी पाए गए हैं.
लक्ष्य से तीन गुना अधिक आवेदन से बढ़ा शक
सरकार की ओर से पलामू जिले को 1 लाख 765 किसानों का फसल बीमा कराने का लक्ष्य दिया गया था. इसके विपरीत जिले में कुल 3 लाख 10 हजार 838 आवेदन जमा कर दिए गए. यानी तय लक्ष्य से करीब तीन गुना अधिक आवेदन भरे गए. आवेदन की संख्या असामान्य रूप से अधिक होने पर तत्कालीन उपायुक्त शशि रंजन ने पूरे मामले की गहन जांच के आदेश दिए थे.
सभी अंचलों में हुई आवेदन की जांच
पूर्व डीसी शशि रंजन के निर्देश पर जिले के सभी अंचलों के सीओ को फसल बीमा से जुड़े आवेदन जांच के लिए भेजे गए. विस्तृत जांच के बाद चौंकाने वाले तथ्य सामने आए. कुल 3 लाख 10 हजार 838 आवेदनों में से केवल 84 हजार 237 आवेदन ही सही पाए गए. शेष 2 लाख 26 हजार 601 आवेदन फर्जी घोषित किए गए.
ऋणी और गैर ऋणी किसानों का आंकड़ा
जांच में यह भी स्पष्ट हुआ कि स्वीकृत 84 हजार 237 आवेदनों में से 37 हजार 861 आवेदन ऋण लेकर खेती करने वाले किसानों के हैं. वहीं 72 हजार 729 आवेदन ऐसे किसानों के हैं, जिन्होंने किसी तरह का कृषि ऋण नहीं लिया था. यह आंकड़ा भी योजना में गड़बड़ी की ओर इशारा करता है.
आच्छादित भूमि से तीन गुना अधिक का बीमा
कृषि विभाग की रिपोर्ट के अनुसार पलामू जिले में कुल आच्छादित कृषि भूमि 67 हजार 308 हेक्टेयर है. जबकि बीमा कंपनी द्वारा 2 लाख 32 हजार 213.77 हेक्टेयर भूमि का फसल बीमा पंजीकरण कर दिया गया था. यह आंकड़ा वास्तविक कृषि भूमि से लगभग तीन गुना अधिक है, जिसने पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
डीसी ने अधिकारियों से मांगी जवाबदेही
इस मामले को गंभीरता से लेते हुए डिस्ट्रिक्ट लेवल मॉनिटरिंग कमेटी के अध्यक्ष सह उपायुक्त ने सभी संबंधित अधिकारियों को 15 दिनों के भीतर जांच रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया था. डीसी ने स्पष्ट रूप से पूछा था कि जब कृषि विभाग के रिकॉर्ड में केवल 67 हजार 308 हेक्टेयर भूमि है, तो तीन गुना अधिक भूमि का बीमा कैसे किया गया.
ऐसे की गई फसल बीमा में गड़बड़ी
जांच में सामने आया कि एक ही जमीन का कई बार फसल बीमा कर दिया गया था. जमीन एक, गांव एक और पंचायत एक होने के बावजूद परिवार के हर सदस्य के नाम पर उसी जमीन का अलग-अलग बीमा करा दिया गया. कुछ मामलों में तो जिन किसानों के पास पांच एकड़ जमीन थी, उनका ढाई गुना तक यानी करीब पांच हेक्टेयर भूमि का बीमा करा दिया गया.
जांच के बाद कितने आवेदन हुए स्वीकृत
बीमा कंपनी के अनुसार खरीफ फसल के लिए कुल 3 लाख 10 हजार 838 आवेदन प्राप्त हुए थे, जिनके आधार पर 2 लाख 32 हजार 213.77 हेक्टेयर भूमि का बीमा दिखाया गया. लेकिन जांच के बाद केवल 84 हजार 237 आवेदन स्वीकृत किए गए. इन आवेदनों के तहत 77 हजार 222 हेक्टेयर भूमि का ही बीमा मान्य किया गया.
रबी फसल बीमा में भी सामने आई अनियमितता
रबी फसल के लिए 8 हजार 954 आवेदन स्वीकृत किए गए हैं. इनमें 5 हजार 295 ऋणी किसान और 6 हजार 189 गैर ऋणी किसान शामिल हैं. रबी फसल बीमा के तहत कुल 8 हजार 61.62 हेक्टेयर भूमि शामिल पाई गई है.
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आगे की कार्रवाई पर टिकी निगाहें
इतने बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा सामने आने के बाद अब कृषि विभाग, जिला प्रशासन और बीमा कंपनी की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं. प्रशासनिक स्तर पर आगे की कार्रवाई और जिम्मेदारों पर कार्रवाई को लेकर किसानों और आम लोगों की निगाहें टिकी हुई हैं.
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By KumarVishwat Sen
कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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