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बेतला नेशनल पार्क : बाघिन को जंगली भैंसों ने घेर कर मार डाला, एक्सपर्ट बोले- कमजोर होने के कारण नहीं कर सकी सामना

Updated at : 17 Feb 2020 6:46 AM (IST)
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बेतला नेशनल पार्क : बाघिन को जंगली भैंसों ने घेर कर मार डाला, एक्सपर्ट बोले- कमजोर होने के कारण नहीं कर सकी सामना

संतोष बेतला : पलामू टाइगर रिजर्व के बेतला नेशनल पार्क में जंगली भैंसों के झुंड ने बाघिन को घेरकर मार डाला. शनिवार की देर शाम में बाघिन का शव चतुर बथुआ (रोड नंबर दो) के पास मिला. उस स्थान पर जंगली भैंसों (बायसन) के साथ मुठभेड़ होने का प्रमाण मिला है. विशेषज्ञों का मानना है […]

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संतोष
बेतला : पलामू टाइगर रिजर्व के बेतला नेशनल पार्क में जंगली भैंसों के झुंड ने बाघिन को घेरकर मार डाला. शनिवार की देर शाम में बाघिन का शव चतुर बथुआ (रोड नंबर दो) के पास मिला. उस स्थान पर जंगली भैंसों (बायसन) के साथ मुठभेड़ होने का प्रमाण मिला है. विशेषज्ञों का मानना है कि बूढ़ी होने के कारण बाघिन अपना बचाव नहीं कर सकी.
10 से 20 जंगली भैंसों के झुंड ने पहले दौड़ाया : विभागीय पदाधिकारी के अनुसार, 10 से 20 की संख्या में मौजूद बायसन के झुंड ने बाघिन को कुछ दूर दौड़ाया और उसके बाद मार डाला. बाघिन की पीठ पर सींग के निशान पाये गये हैं. वहीं सिर में भी गंभीर चोट के घाव मौजूद हैं. घटना शनिवार शाम छह बजे की है. रात्रि पेट्रोलिंग के क्रम में जब वनकर्मी घटनास्थल पर पहुंचे, तो बाघिन के शव को सड़क किनारे पड़ा देखा. इसके बाद विभागीय पदाधिकारी को सूचना दी गयी.
कमजोर थी बाघिन, बच्चा बायसन का शिकार करने के दौरान जंगली भैंसों ने किया हमला
मेडिकल टीम ने किया बाघिन का पोस्टमार्टम, किडनी और लिवर का बिसरा रखा सुरक्षित
14 वर्ष बतायी जा रही उम्र
घटनास्थल पर क्षेत्र निदेशक वाइके दास, आरसीसीएफ मोहनलाल, उपनिदेशक कुमार आशीष और रेंजर प्रेम प्रसाद पहुंचे. पर्यटकों के पार्क में प्रवेश पर रोक लगा दी गयी. वहीं, पूरे बेतला नेशनल पार्क की घेराबंदी कर दी गयी है. पशु चिकित्सकों की टीम ने बाघिन का पोस्टमार्टम कर किडनी और लिवर का बिसरा फॉरेंसिक जांच के लिए सुरक्षित रख लिया. इसके बाद शव को जला दिया गया. बाघिन की उम्र 14 वर्ष बतायी जा रही है. पोस्टमार्टम टीम में डॉ अजय कुमार ,डॉ चंदन कुमार डे आदि शामिल थे.
शावक भी होने के उम्मीद : यह भी जानने का प्रयास किया जा रहा है कि बाघिन के साथ कहीं अन्य शावक भी तो नहीं थे. हो सकता है बाघिन शावकों के साथ वहां पहुंची हो. हमले के बाद शावक अन्यत्र चले गये हों.
घायल बायसन की हो रही खोज
घटनास्थल पर बाघिन द्वारा अपने बचाव में जंगली भैंसों पर भी हमला करने के प्रमाण मिले हैं. वन विभाग के कर्मचारी घायल बायसन की खोज में जुटे हैं. जगह-जगह लगाये गये ट्रैप कैमरे और सर्विलांस कैमरे के फुटेज को खंगाला जा रहा है.
पीटीआर में तीन बाघ होने के मिल रहे हैं प्रमाण
पीटीआर क्षेत्र निदेशक वाइके दास ने बताया कि पलामू टाइगर रिजर्व में तीन ‌बाघ होने के प्रमाण मिल रहे थे. जिसमें एक बेतला पार्क की बाघिन भी थी. अन्य दो बाघ पलामू टाइगर रिजर्व में मौजूद हैं. इनकी तसवीरें लगातार ट्रैप कैमरा में कैद हो रही हैं. पिछले 10 साल में एक भी बाघ या बाघिन की मौत होने की पुष्टि नहीं हो पायी है.
हमले में हुई बाघिन की मौत : क्षेत्र निदेशक
पीटीआर के क्षेत्र निदेशक वाइके दास के अनुसार, बाघिन बूढ़ी हो गयी थी. बायसन अपने बच्चों के साथ झुंड में थे. जैसे ही बाघिन वहां पहुंची, तो उसे घेर लिया गया. बाघिन की पीठ पर बायसन के सींग से हमला करने के निशान मिले हैं.
पोस्टमार्टम में चिकित्सकों ने बताया है कि बूढ़ी होने के कारण बाघिन के शरीर के महत्वपूर्ण अंग काम नहीं कर रहे थे. इसलिए जंगली भैसों के हमले में वह बचाव नहीं कर सकी. संभवतः उसको हार्ट अटैक हो गया.घटनास्थल को सील कर दिया गया है. पार्क में पर्यटकों के प्रवेश पर एक दिन के लिए रोक लगायी गयी है. पूरे मामले की जानकारी एनटीसीए को भी दे दी गयी है.
एक्सपर्ट बोले : कमजोर होने से बाघिन जंगली भैंसों का सामना नहीं कर सकी
घटना की सूचना मिलने के बाद पलामू टाइगर रिजर्व पहुंचा. बाघिन कमजोर हो गयी थी. चार नवंबर को वह बेतला में देखी गयी थी. कमजोर होने के कारण वह जंगली भैंसों के झुंड का सामना नहीं कर सकी. पोस्टमार्टम में उसके पेट में कुछ नहीं मिला. शरीर पर एक 3-3.5 इंच का छेद पाया गया है. ऐसा लग रहा है कि बायसन के बच्चे का वह शिकार करने की कोशिश कर रही होगी, तभी जंगली भैंसों ने हमला कर दिया होगा. जिसका वह विरोध नहीं कर पायी.
पीटीआर का हैबेटिट अच्छा, ध्यान नहीं दे रहा विभाग : पलामू टाइगर रिजर्व का हैबिटेट अच्छा है. यहां सभी जानवरों के रहने और खाने की व्यवस्था अच्छी है. मेरा मानना है कि यहां बाघ है लेकिन उसे देखनेवाला कोई नहीं हैं.
वहां काम करनेवाले जंगल का विजिट नहीं करते हैं. अब तो बाघ की संख्या स्कैट (मल) के डीएनए जांच से होती है. जब वहां काम करनेवाले सुदूर जंगल से स्कैट ही नहीं लायेंगे, तो सही संख्या का पता कैसे चलेगा. पीटीआर के अधिकारियों और कर्मचारियों का संपर्क भी गांव से कट रहा है. इस कारण सही समय पर सूचना भी नहीं मिल पाती है. गांववालों की सहायता भी नहीं मिल पाती है. जंगल में रहनेवालों की सही सूचना के लिए गांव से सही संपर्क भी होना जरूरी है.
डीएस श्रीवास्तव, विशेषज्ञ, वन्य प्राणी
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