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उजड़ रहे हैं जंगल, वन विभाग मौन

Updated at : 13 Jun 2024 5:43 PM (IST)
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उजड़ रहे हैं जंगल, वन विभाग मौन

किस्को व पेशरार प्रखंड क्षेत्र के वनों में बीते कुछ वर्षों में माफियाओ की बुरी नजर लग गयी है. जिसके परिणाम स्वरूप तेजी से वनों का विनाश हुआ है

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संदीप साहू

किस्को. किस्को व पेशरार प्रखंड क्षेत्र के वनों में बीते कुछ वर्षों में माफियाओ की बुरी नजर लग गयी है. जिसके परिणाम स्वरूप तेजी से वनों का विनाश हुआ है. तेजी से वन उजड़ रहे हैं और वन विभाग मौन है. लकड़ी माफियाओं की चांदी है. उग्रवाद का भय दिखा कर वनकर्मी जंगल जाने से परहेज करते हैं, लेकिन जंगल में पेड कटने की जानकारी उन्हें होती है. कुछ स्थानों पर वनों को बचाने की मुहिम रंग लाती दिखी. अधिकांश स्थानों पर वन बचाने के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति हुई है. जिसका खामियाजा आज लोग तेजी से बढ़ती गर्मी के रूप में भुगत रहे हैं. एक ओर माफियाओ द्वारा जंगलों में अंघाघुंघ कुल्हाड़ी चलाकर कीमती व इमारती पेड़ काटे गये. वहीं दूसरी ओर जंगल में रहने वाले ग्रामीणों द्वारा तेजी से जंगलों में आग लगाकर नए पौधे उगने से रोका गया. प्रति वर्ष वनों में आग लगाने के मामले बढ़ते जा रहे हैं. जिसका परिणाम है कि नए पौधे उगने बंद हो गये हैं. वहीं पुराने पौधे की कटाई तेजी से चल रही है. इससे जंगल उजड़ते जा रहे हैं और वनों का क्षेत्रफल भी घटता जा रहा है. किसी समय ऐसे कई घने जंगल थे. जहां इन जंगलों में सूर्य की रोशनी की किरणें भी नहीं पहुंच पाती थी. लोग जंगलों में प्रवेश को डरते थे. वहां अब धरती तपने लगी हैं. वही वनपट्टा के चक्कर में ग्रामीणों द्वारा तेजी से कुछ क्षेत्र के वनों को बीते कुछ वर्षों में साफ किया गया है. पेशरार प्रखंड व अंचल के अधिकारियों का कहना है कि जंगल के बावजूद सड़कों में चलने में गर्मी की मार झेलनी पड़ती है. वृद्वजनों का कहना है कि ऐसे कई घने जंगल एक दशक पहले तक थे, लेकिन अब वैसी स्थिति नही हैं. वन माफियाओं ने विगत एक दशक में वनों का तेजी से विनाश किया है. जिसका असर हाल के वर्षों में पर्यावरण पर भी दिखा है. वर्तमान में तुइमूपाट, मन्हेपाट, जावाखाड़, दुंदरू, जवाल, पाखर सहित दो दर्जन से अघिक ऐसे जंगली इलाके हैं, जहां वन माफियाओं ने हजारों पेड़ काट डाले हैं. इन जंगलों में साल, आसन, काज, गम्हार सहित अन्य कीमती पेड़ों के बोटा तथा चौपहल को अक्सर शाहीघाट के रास्ते साइकिल या ट्रैक्टर में लादकर लोगों को लाते देखा जा सकता है. सबसे अधिक लकड़ी साहीघाट के रास्ते आरेया चरहु की ओर से ढोया जाता है. वहीं पेशरार के जंगलों को काटकर हिसरी, मेरले के रास्ते से रात के अंधेरे में ढोया जाता है. वनों की कटाई का दृश्य चलते फिरते जवाखाड़ में देखी जा सकती है. पेशरार मुख्य सड़क में जावाखाड़ के समीप बीते तीन चार वर्षों पूर्व घने जंगल थे जो आज पूरी तरह साफ हो चुका है. हालांकि वन विभाग के अधिकारी व कर्मियों द्वारा सूचना के तहत छापेमारी कर कई बार अवैघ बोटा, चौखट, खिड़की, दरवाजा बरामद किया गया है, परंतु सुदूर जंगली एवं पहाड़ी इलाकों में वन माफियाओं के विरुद्ध छापामारी करने में अक्सर अधिकारी कतराते रहे हैं. बताया जाता हैं कि नक्सल प्रभावित क्षेत्र में उग्रवादियों ने यहां पहली बार पैर पसारना शुरू किया,उस दौरान जंगलों को बचाने के लिए नक्सलियों ने ऐसे वन माफियाओ के खिलाफ जमकर पिटाई करने तथा साइकिल व लकड़ी जब्त करने जैसी समाचार अक्सर अखबार की सुर्खिया बनती रहती थी.लेकिन वर्तमान में वन माफियाओं ने नक्सलियों से सांठ-गांठ कर वनों का विनाश शुरू कर दिया हैं हालांकि वन विभाग के अधिकारियों की मानें, तो हाल के वर्षों में वनों का क्षेत्रफल बढ़ा हैं, परंतु वन क्षेत्र के आसपास रहने वाले ग्रामीणों की मानें, तो स्थिति इसके विपरीत है. हाल के वर्षों तक जिन क्षेत्र में घने वन थे,वहां चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई देती हैं, परंतु इन वन क्षेत्र में अब चिड़ियों की चहचहाहट की जगह वन काटने वाली टांगियों की गूंज सनाई देती है.

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