पांच कुआं व सात चापाकल के भरोसे हैं 6000 ग्रामीण

Updated at : 14 May 2019 1:26 AM (IST)
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पांच कुआं व सात चापाकल के भरोसे हैं 6000 ग्रामीण

लोहरदगा : कैरो प्रखंड मुख्यालय से 12 किमी दूर हनहट पंचायत के गितिलगढ़ और हुदू गांव के लोग पानी के लिए भटक रहे हैं. ज्ञात हो कि यह दोनों गांव पहाड़ के किनारे बसा है. इन दोनों गांवों में न तो कुआं में पर्याप्त पानी रहता है और न ही चापाकल ही सक्सेस हो पाता […]

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लोहरदगा : कैरो प्रखंड मुख्यालय से 12 किमी दूर हनहट पंचायत के गितिलगढ़ और हुदू गांव के लोग पानी के लिए भटक रहे हैं. ज्ञात हो कि यह दोनों गांव पहाड़ के किनारे बसा है. इन दोनों गांवों में न तो कुआं में पर्याप्त पानी रहता है और न ही चापाकल ही सक्सेस हो पाता है. यहां के लोगों के लिए डीप बोरिंग ही पानी का साधन बन सकता है लेकिन यहां डीप बोरिंग कभी किसी ने कराने का प्रयास ही नहीं किया. जिसके कारण पेयजल की समस्या यहां यथावत बनी हुई है.

हुदू गांव में 250 घरों में लगभग 3000 लोग रहते हैं. हुदू में कहने को तो 20 से 25 चापाकल है परंतु इसमें अधिकतर चापाकल खराब पड़ा हुआ है. सिर्फ पांच चापाकल और दो कुआं के भरोसे जैसे-तैसे ग्रामीण इस भीषण गर्मी में अपना और मवेशियों की प्यास बुझाने का प्रयास कर रहें हैं. वहीं दूसरी और हुदू गांव से सटे गिलितगढ़ में 200 घरों में लगभग 3000 लोग रहते हैं. यहां चापाकल बहुत है पर सिर्फ दो चापाकल कारगर है. वहीं तीन कुआं है जिसके सहारे ग्रामीण इस भीषण गर्मी में प्यास बुझा रहे है़ं यहां पानी के लिए सुबह से ही महिला और बच्चों की लाइन लग जाती है और सभी बारी-बारी से पानी भरने का इंतजार करते हैं. कभी-कभी तो अपना नंबर आते-आते तक चापाकल में पानी ही खत्म हो जाता है.

पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहां बना कुआं लोगों की प्यास बुझाने के लिए न काफी साबित हो रहा है. खेतों में बने सिचाई कूप से लोग काम चलाते हैं. गांव से खेत की दूरी लगभग एक किमी है. जहां से लोगों को पानी लाना पड़ता है. हुदू में एक सोलर संचालित प्याऊ है पर गितिलगढ़ ग्राम में एक भी सोलर संचालित प्याऊ नहीं है़ ग्रामीणों को गर्मी में पानी के लिए दूर-दूर तक भटकना पड़ता है. हुदू और गितिलगढ़ के लगभग सभी परिवार कृषक हैं और उनका जीवनयापन का मुख्य साधन खेती-बारी है पर गर्मी का मौसम आते ही किसानों के सामने फसल सिंचाई से लेकर पीने के पानी तक की भारी किल्लत हो जाती है.

क्षेत्र के किसान जनवरी,फरवरी आते ही रोजी-रोजगार के लिए दूसरे राज्य में पलायन कर जाते हैं. घरों में वृद्ध, बच्चे ही रह जाते है़ं घर के मुखिया बाहर कमाने जाते हैं जिसका सीधा असर स्कूली बच्चों पर पड़ता है़ बच्चे घर के छोटे-मोटे कामों में उलझ जाते हैं. जिस कारण समय से स्कूल नहीं पहुंचते हैं और शिक्षा से वंचित हो जाते हैं. लोगों का कहना है कि गांव के संपूर्ण विकास के लिए सरकार व क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों को ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है तभी ग्राम स्तर पर मूलभूत सुविधा के साथ बच्चों का भविष्य उज्ज्वल होगा.

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