बलवा व महमदिया में पढ़ुआ मेहमान के रूप में है रेणु की पहचान

बलवा व महमदिया में पढ़ुआ मेहमान के रूप में है रेणु की पहचान
– अमरकथा शिल्पी फणीश्वरनाथ रेणु के जन्मदिन पर विशेष – रेणु की चर्चा होने पर उनके यादों में खो जाते है गांव के लोग कटिहार यूं तो अररिया जिले के फारबिसगंज के समीप औराही हिंगना अमरकथा शिल्पी फणीश्वर नाथ रेणु की वजह से जाना जाता है. प्रसिद्ध कथाकार रेणु का कटिहार जिले से भी गहरा रिश्ता है. कटिहार जिले के हसनगंज प्रखंड के महमदिया व उसके समीप के बलवा गांव से न केवल केवल गहरा रिश्ता रहा है बल्कि यह गांव उनके सगे संबंधियों से भरा पड़ा है लेकिन जिस तरह औराही हिंगना को ख्याति एवं सुर्खियां मिली है उस तरह महमदिया एवं बलवा गांव को सुर्खियां नहीं मिल सकी. रेणु के जयंती या पुण्यतिथि पर उन्हें कभी कभी याद कर लिया जाता है. बुधवार को चार मार्च है. इस दिन को अमर कथा शिल्पी रेणु के जन्मदिन के रूप में जाना जा रहा है. 105 वर्ष पूर्व इसी दिन 1921 में उनका जन्म औराही हिंगना में हुआ था. रेणु के जन्मदिन से कटिहार सहित सीमांचल व कोसी के इलाके में कई कार्यक्रमों के आयोजन की तैयारी की गयी है. कथा सम्राट रेणु की जन्मदिन होने से कटिहार से उनके रिश्ते पर प्रभात खबर ने पड़ताल की है. प्रभात खबर के पड़ताल क्रम में यह जानकारी मिली कि इस जिले के हसनगंज प्रखंड अंतर्गत महमदिया व बलवा गांव से रेणु गहरा रिश्ता रहा है. रेणु की पहली शादी बलवा गांव के रेखा से ही हुई थी पर पहली पत्नी की असामयिक मृत्यु के बाद रेणु की दूसरी शादी समीप के महमदिया गांव में ही पदमा से हुआ था. महमदिया गांव में ही रेणु की बहन की शादी हुई. अपने व बहन का ससुराल तथा अन्य सगे संबंधियों के कारण रेणु का महमदिया व बलवा गांव में आना-जाना लगा रहता था. प्रभात खबर के साथ बातचीत में गांव के कई लोगों ने उनकी यादों को साझा किया. लोगों की मानें तो जब भी रेणु यहां पहुंचते थे तो उन्हें देखने सुनने के लिए लोगों की भीड़ जुट जाती थी. उस समय गांव में अधिक पढ़े लिखे लोग नहीं थे. पर रेणु सबके साथ एडजस्ट कर जाते थे. पढ़े-लिखे लोगों के साथ उनकी तरह व्यवहार विचार करते थे. निरक्षर एवं ग्रामीण परिवेश में रहने वाले लोगों के साथ उनकी भाषा व उनकी शैली में ही बातचीत करते थे. गांव के हर लोगों के लिए वहां काफी लोकप्रिय व दुलारे रहे है. गांव के लोगों से रेणु को पढ़ुआ मेहमान करके पुकारते थे. रेणु की यादों में जीवंत हो उठता है महमदिया गांव हसनगंज प्रखंड का महमदिया गांव के लोग आज भी अगर रेणु की चर्चा होती है तो सब लोग एक दूसरे को उनकी कृतियों को बताते एवं उनके समय के बातों में खो जाते है. बलवा गांव में ही काशी विश्वास की बेटी रेखा से रेणु की पहली शादी हुई थी. रेखा के असामयिक निधन के बाद समीप के गांव महमदिया में खूबलाल विश्वास की पुत्री पदमा से रेणु की दूसरी शादी हुई थी. इसी गांव में रेणु की बहन मनोरमा देवी उर्फ मानो का ससुराल भी है. रेणु की बेटी कविता राय भी महमदिया गांव में ही रहती है. रेणु के सगे संबंधियों से यह गांव भरा पड़ा है. इसलिए रेणु के संदर्भ में महमदिया गांव का खास महत्व है. रेणु जब भी इस गांव में पहुंचते तो आम लोगों के साथ अपने अनुभव को साझा करते. गांव के लोगों के साथ खुलकर बात करते. गांव के लोग रेणु को पढ़ुआ मेहमान से बुलाते थे. दरअसल जिस तरह रेणु की रचनाएं व कहानियां ग्राउंड रियलिटी से जोड़ती है. वह आज भी प्रासंगिक नजर आता है. भले ही भागदौड़ की जिंदगी एवं आधुनिकता के दौर में लोगों के पास वक्त नहीं है. पर जिस तरह रेणु ने ग्रामीण परिवेश एवं संस्कृति को अपनी कहानियों एवं रचनाओं में परिलक्षित किया है. वह अपने आप में ही अनूठा है. यही वजह है कि रेणु की रचनाओं एवं कथा-कहानियों पर बड़े-बड़े दिग्गज लेखकों ने समीक्षा की तथा रिसर्च भी किया है. आज जब रेणु के जन्मदिन को लेकर उन्हें याद करने की तैयारी हो रही है. तब कटिहार जिले के महमदिया व बलवा गांव बरबस ही लोगों को याद आने लगी है. खासकर महमदिया गांव पहुंचने तथा रेणु की चर्चा करने पर लोग उसकी यादों में खो जाते है. रेणु की चर्चा मात्र से ही महमदिया गांव के लोग उसके के कई घटनाक्रम को याद कर उसमें खो जाते है. उपेक्षित है महमदिया व बलवा गांव जिस तरह कथाशिल्पी रेणु का लगाव-जुड़ाव महमदिया व बलवा गांव से रहा है. वैसी प्रसिद्ध इस गांव को नहीं मिली. आज भी यह गांव कई बुनियादी सुविधाओं के लिए जद्दोजहद कर रहा है. 2021 में ””मैं कटिहार हूं”” की टीम की ओर से जब रेणु पर आधारित डॉक्युमेंट्री बनाने की जब पहल हुई. तब से सोशल मीडिया के जरिए लोगों ने रेणु के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त किया. मैं कटिहार हूं टीम के प्रमुख आलोक कुमार ने बातचीत कहते है कि महमदिया एवं बलवा गांव से जुड़ी रेणु की कई यादें है. जिस पर किताबें लिखी जा सकती है. इन दोनों गांव को जिस तरह महत्व दिया जाना चाहिए. वैसा नहीं मिला. बातचीत में वह कहते हैं कि रेणु के प्रतिमा लगाने की बात चल रही है. लोगों को सहयोग करना पड़ेगा. केबी झा कॉलेज के अवकाश प्राप्त प्राचार्य डॉ राजेंद्र नाथ मंडल भी कहते हैं कि रेणु का कटिहार जिले से गहरा रिश्ता रहा है. साहित्यिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में इस गांव को स्थापित किया जा सकता है. साथ ही यहां रेणु के आदमकद प्रतिमा लगाया जाना चाहिए. कहते है साहित्यकार जाने माने साहित्यकार व रेणु की रचनाओं-कृतियों पर शोध करने वाले हिंदी के अवकाशप्राप्त प्रोफेसर डॉ सुरेंद्र नारायण यादव कहते है कि रेणु को जिस तरह की प्रसिद्धि मिलनी चाहिए. वह नहीं मिली. रेणु की रचनाएं वैश्विक स्तर की है. उसकी रचनाओं में आंचलिकता झलकती है. पर वह हर जगह परिलक्षित होता है. मसलन कटिहार के किसी गांव की स्थिति रेणु की रचना में झलकती है तो वही स्थिति कनाडा के गांव में भी है. इसलिए रेणु को आंचलिकता के दायरे में बांधा नहीं जा सकता है.
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