60 वर्ष से रामनवमी का झंडे बना रहे अब्दुल हमीद

ऐसे समय में जब धर्म और संप्रदाय के नाम पर बात-बात पर तनातनी हो रही है़ शहर के स्टेशन रोड के पुराने बैंक ऑफ बड़ौदा के नीचे सिलाई का कार्य करने वाले अब्दुल हमीद अलग मिसाल पेश कर रहे हैं.
झुमरीतिलैया. ऐसे समय में जब धर्म और संप्रदाय के नाम पर बात-बात पर तनातनी हो रही है़ शहर के स्टेशन रोड के पुराने बैंक ऑफ बड़ौदा के नीचे सिलाई का कार्य करने वाले अब्दुल हमीद अलग मिसाल पेश कर रहे हैं. हमीद पिछले 60 वर्षों से रामनवमी के झंडे सिल रहे हैं. उनका यह कार्य केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा से जुड़ा हुआ है़ उनका परिवार पीढ़ियों से रामनवमी के पवित्र झंडों की सिलाई करता आ रहा है़ पहले वे लोहानी मार्केट के सामने 40 वर्ष तक सिलाई का कार्य कर चुके हैं, लेकिन पिछले कई वर्षों से बैंक ऑफ बड़ौदा के नीचे सिलाई का कार्य कर रहे हैं. जानकारी के अनुसार रामनवमी का पर्व जैसे ही नजदीक आता है अब्दुल हमीद अपनी दुकान पर झंडों की सिलाई में जुट जाते हैं. वे बताते हैं कि गया से कच्चा माल खरीदकर झंडों की सिलाई करते हैं. उनके बनाए झंडे सिर्फ झुमरीतिलैया में ही नहीं, बल्कि चौपारण, चतरा, इटखोरी सहित कई इलाकों में भेजे जाते हैं. रामनवमी से दो महीने पहले ही वे सिलाई का कार्य शुरू कर देते हैं, ताकि झंडों की मांग को पूरा किया जा सके़ हर साल की तरह इस बार भी उनकी अस्थायी दुकान झंडा चौक पर लगने वाली है, जहां श्रद्धालु आकर 50 से 100 रुपये तक के झंडे खरीद सकते हैं.
तीन पीढ़ियों से परिवार कर रहा काम
अब्दुल हमीद के परिवार की तीन पीढ़ियां रामनवमी के झंडों की सिलाई में लगी रही है. उनके पिता मोजाहिम खलीफा भी महावीरी पताका की सिलाई किया करते थे. उन्होंने ही अब्दुल हमीद को यह हुनर सिखाया़ इनका परिवार मूल रूप से गौरिया करमा बरही का निवासी है, लेकिन लंबे समय से झुमरीतिलैया में रहकर सिलाई का कार्य कर रहे हैं. हमीद बताते हैं कि हनुमान जी की सेवा से ही उनका घर चलता है. वे अपनी मेहनत और लगन से परिवार का भरण-पोषण करते हैं. अपने बेटे से एक भी पैसा नहीं लेते. उनका मानना है कि ईश्वर ने उन्हें इस कार्य के लिए चुना है और जब तक शरीर में ताकत रहेगी, वे यह कार्य करते रहेंगे. अब्दुल हमीद मानते है कि आज के समय में धर्म को लेकर लोगों के बीच दूरियां बढ़ रही हैं, लेकिन उनका कार्य सभी धर्मों से ऊपर उठकर भाईचारे और सद्भाव को दर्शाता है. वे कहते हैं मैं हनुमान जी का कारीगर हूं, मेरे पूर्वज भी यही काम करते थे. इससे हमारा घर चलता है और आस्था जुड़ी हुई है़ धर्म से पहले इंसानियत होती है और इसी के चलते मैं बिना किसी भेदभाव के रामनवमी के झंडे सिलता हूं.
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