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Durga Puja Special: चंचालिनी धाम में सिंदूर चढ़ाना है वर्जित, मां दुर्गा ने स्वयं दिए थे राजा को दर्शन

Updated at : 11 Oct 2024 7:00 AM (IST)
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Durga Puja Special: चंचालिनी धाम में सिंदूर चढ़ाना है वर्जित, मां दुर्गा ने स्वयं दिए थे राजा को दर्शन

चंचालिनी धाम में मान्यता है कि देवीपुर के राजा जब जंगल में शिकार खेलने गए थे तभी उन्हें साक्षात शेर पर सवार मां दुर्गा ने दर्शन दिये थे. मां ने सपने में आकर राजा को पहाड़ में अपने वास करने की बात कही थी.

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Durga Puja, विकास कुमार(कोडरमा) : नवरात्र के मौके पर जहां मां दुर्गा के 9 अलग-अलग स्वरूपों की पूजा हो रही है. वहीं कोडरमा जिले का एक ऐसा धार्मिक स्थान है जहां मां के 10वें स्वरूप यानी की कन्या रूप की पूजा वर्ष भर होती है. खास यह भी है कि यहां माता को श्रृंगार तो चढ़ाया जाता है, लेकिन सिंदूर चढ़ाना पूरी तरह से वर्जित है.

ऐसे जा सकते हैं चंचालिनी धाम

प्रसिद्ध धार्मिक स्थल मां चंचालिनी धाम कोडरमा जिला मुख्यालय से करीब 33 किलोमीटर दूर पहाड़ों और जंगलों के बीच कोडरमा-गिरिडीह मुख्य मार्ग पर नवलशाही थाना क्षेत्र में स्थित है. श्रद्धालु कानीकेंद मोड़ से आठ किलोमीटर दूर जंगल में स्थित इस धाम में पहुंच सकते हैं यहां करीब 400 फीट की ऊंचाई वाले पहाड़ी के बीच में मां चंचला देवी विराजमान हैं. यहां से थोड़ी दूर एक गुफा है. गुफा के अंदर भीत्ती चित्र में मां दुर्गा के साथ अलग-अलग रूपों का दर्शन होता है. घने जंगलों से सुसज्जित इस पहाड़ी के शिखर पर एक अन्य लंबी कंद्रा है, जहां भगवान भोलेनाथ का शिवलिंग है. पहाड़ के ऊपर तक जाने के लिए कुछ ही ऊंचाई तक सीढ़ी बनी है. इस जगह पर पहुंचने का रास्ता आसान नहीं है.

पाइप के सहारे रेंगते हुए पहाड़ चढ़ते हैं भक्त

श्रद्धालु पाइप के सहारे रेंगते हुए इस पहाड़ को चढ़ते हैं और भोले बाबा का दर्शन करते हैं. पहाड़ पर गुफा भी है जहां पूजा की जाती है. बताया जाता है कि 1956-57 में खेशमी राजवंश ने पहाड़ पर जाने के लिए सीढ़ीयों का निर्माण कराया था. मगर माता की इच्छा के कारण पूरी पहाड़ी तक सीढी नहीं बनाई जा सकी. इसलिए यहां आने वाले भक्त पहाड़ के पत्थरों व पाइप को पकड़-पकड़ कर चोटी तक पहुंचते हैं. यहां पूजा अर्चना करना एक चुनौती पूर्ण कार्य है फिर भी प्रतिवर्ष सैकड़ों लोग यहां पूजा करने आते हैं.

पशु बली की है प्रथा, पूजा में सिंदूर वर्जित

यहां पशु बली प्रथा है, मगर पूजा अर्चना में सिंदुर पूर्णत: वर्जित है. मान्यता है कि यहां कठिन परिश्रम कर पहाड़ की चोटी पर पहुंचकर पूजा-अर्चना करने से मन्नतें पूरी होती है. इसे माता का आर्शीवाद ही कहा जाए तभी तो इतने चुनौतीपूर्ण तरीके से पूजा अर्चना करने के दौरान आज तक किसी भी भक्त को किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं हुआ है.

मन्नत मांगने के लिए धरना देती हैं महिलाएं

इस धाम की प्रसिद्धी की बड़ी वजह यह भी है कि यहां पर दूर-दूर से लोग पूजा अर्चना कर मन्नत मांगने तो आते हैं. महिलाएं अपनी मन्नत मांगने के लिए धरना भी देती हैं. वैसे वर्ष भर यहां लोगों का आना-जाना लगा रहता है. लेकिन नवरात्र के समय में यहां पूजा व दर्शन का खास महत्व है.

1648 में देवीपुर के राजा ने शेर पर सवार मां दुर्गा के किए थे दर्शन

स्थानीय लोगों के अनुसार लगभग 200 वर्षों से अधिक समय से चंचालिनी धाम में पूजा हो रही है. वर्ष 1648 के करीब जब देवीपुर के राजा इस घनघोर जंगल में शिकार खेलने आए हुए थे. नीचे से ही इस पहाड़ी पर राजा को साक्षात शेर पर सवार मां दुर्गा का दर्शन हुआ था. इसके बाद राजा को आभास हुआ कि यहां पहाड़ पर मां दुर्गा हैं. लेकिन उस समय पहाड़ पर चढ़ने का कोई साधन नहीं था. इसके बाद राजा जगत नारायण सिंह ने अन्य लोगों और अपने पुरोहितों के साथ इस पहाड़ पर चढ़कर पूजा अर्चना शुरू की.

मां दुर्गा के स्वरूप दो जोड़े शेर ने दिए थे दर्शन

कहा जाता है कि उस समय पूजा करने के दौरान ही साक्षात मां दुर्गा के स्वरूप में दो जोड़े शेर पूजा स्थल पर खड़े हो गए थे. दर्शन के बाद वे स्वत अपने आप चले गए़. देवीपुर के राजा को मां चंचालिनी ने स्वप्न में आकर उक्त पहाड़ में वास कराने की बात कही थी. इसके बाद राजघराने के द्वारा माता की पूजा-अर्चना शुरू की गई़ तब से यहां राजा के परिवार व स्थानीय लोगों द्वारा पूजा-अर्चना की जाती है.

धाम तक पहुंचने के लिए बन गई है पक्की सड़क

एक समय था जब लोग इस बीहड़ जंगल में प्रवेश करने से भी डरते थे. लेकिन साल 1956 में झरिया की राजमाता सोनामति देवी ने इस मंदिर तक पहुंचने के लिए एक कच्चा रास्ता बनवाया था. उस समय उन्होंने पहाड़ के कठिन रास्ते पर लोहे की दो भारी-भरकम सीढ़ियां लगवाई. हालांकि, श्रद्धालुओं की सुविधा को देखते हुए अब मुख्य सड़क से चंचाल पहाड़ी तक पक्की सड़क बनाई गई है. स्थानीय लोगों के मुताबिक झरिया के राजा काली प्रसाद सिंह को शादी के कई वर्षों तक संतान सुख नहीं मिल रहा था. उस दौरान मां चंचालिनी के दरबार में मन्नत मांगने के लिए 1956 में अपनी पत्नी सोनामती देवी के साथ मां के दरबार में जंगल के बीच दुर्गम रास्तों से होकर पहुंचे थे और राजा काली प्रसाद सिंह को मां चंचालिनी के आशीर्वाद से पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी. चंचालिनी धाम में जिला प्रशासन की पहल पर भी कुछ काम हुए हैं खासकर सीढ़ियों की दशा इन दिनों सुधरी है.

गलत उद्देश्य से आने पर भंवरे करते हैं आक्रमण

ऐसी मान्यता है कि जो भी लोग गलत उद्देश्य लेकर चंचाल पहाड़ पर चढ़ाई करते हैं. उन पर भंवरे के द्वारा आक्रमण कर दिया जाता है. कहा यह भी जाता है कि गलत मंशा से पहुंचने वालों को भंवरा डंक मार मारकर लहूलुहान कर बेहोश कर देता है. मां चंचालिनी के दरबार में श्रद्धालु बिना अन्न-जल ग्रहण किए ही पहाड़ पर चढ़ते हैं और माता की पूजा में प्रसाद के रूप में अरवा चावल,नारियल और मिश्री चढ़ाते हैं. पूजा स्थल से हटकर दीपक जलने वाली गुफा में ध्यान से देखने पर माता के सात रूप पत्थरों पर उभरे नजर आते हैं. यहां की देखरेख मां चंचालिनी विकास समिति के द्वारा की जा रही है.

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Kunal Kishore

लेखक के बारे में

By Kunal Kishore

कुणाल ने IIMC , नई दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा की डिग्री ली है. फिलहाल, वह प्रभात खबर में झारखंड डेस्क पर कार्यरत हैं, जहां वे बतौर कॉपी राइटर अपने पत्रकारीय कौशल को धार दे रहे हैं. उनकी रुचि विदेश मामलों, अंतरराष्ट्रीय संबंध, खेल और राष्ट्रीय राजनीति में है. कुणाल को घूमने-फिरने के साथ पढ़ना-लिखना काफी पसंद है.

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