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डाभाकेंद, चंपापुर व आशाडीह के सूप-डलिया यूपी, बिहार में है डिमांड

नारायणपुर. डाभाकेंद, चंपापुर और आशाडीह गांव में बांस से बनी सुप, डलिया, टोकरी झारखंड ही नहीं, बल्कि बिहार, उत्तर प्रदेश और बंगाल के बाजारों में भी प्रसिद्ध है.

मोहली परिवारों के जीविका का साधन बना बांस का कारोबार, बच्चे भी बुनाई में माहिर निकेश सिन्हा, नारायणपुर प्रखंड के डाभाकेंद, चंपापुर और आशाडीह गांव में बांस से बनी सुप, डलिया, टोकरी झारखंड ही नहीं, बल्कि बिहार, उत्तर प्रदेश और बंगाल के बाजारों में भी प्रसिद्ध है. विशेषकर छठ पूजा जैसे पर्वों में इन वस्तुओं की मांग कई गुना बढ़ जाती है. इन गांवों के सैकड़ों मोहली परिवार पीढ़ियों से बांस की कारीगरी में निपुण हैं और यही उनके जीवन-यापन का प्रमुख साधन है. इन परिवारों के आंगन में दिन-रात बांस की बुनाई का कार्य चलता रहता है. पुरुष जंगलों और बांस के झुंडों से हरे बांस काटकर लाते हैं, जबकि महिलाएं और बच्चे मिलकर सूप, टोकरी, डलिया, पंखा और खांचा जैसी वस्तुएं तैयार करते हैं. मोहली समुदाय की विमला देवी बताती हैं कि यह कार्य उनके पूर्वजों से चला आ रहा है और पूरा परिवार इसी पर निर्भर है. उन्होंने कहा, “हम एक दिन में 25 से 30 सूप बना लेते हैं. छठ पूजा के समय इसकी मांग इतनी बढ़ जाती है कि दिन-रात काम करना पड़ता है. इसी तरह खड़री देवी कहती हैं कि छठ पर्व के दौरान व्यापारी सीधे उनके घरों पर आकर माल खरीदते हैं. वर्तमान में बाजार भाव के अनुसार एक सुप 50 रुपये, डलिया 100 रुपये, सुपति 25 रुपये, खांचा 60 रुपये और पंखा 10 रुपये में बिकता है. एक परिवार इस काम से प्रतिमाह 5 से 6 हजार रुपये तक की आमदनी कर लेता है. यदि वार्षिक गणना की जाए तो प्रति परिवार की आमदनी लगभग 60 से 70 हजार रुपये होती है, जिससे इन गांवों के करीब 400 से अधिक परिवारों की कुल वार्षिक आमदनी 30 लाख रुपये के आसपास पहुंच जाती है. बच्चे भी इस पारंपरिक कला में माहिर हैं. नौवीं कक्षा के छात्र शंकर मोहली, किरण कुमारी और काजल कुमारी स्कूल से लौटने के बाद बांस की वस्तुएं बनाने में अपने माता-पिता का हाथ बंटाते हैं. उनका कहना है कि इस काम से होने वाली आय से घर के खर्च और पढ़ाई का खर्च दोनों पूरे होते हैं. हालांकि, इन कारीगरों की सबसे बड़ी समस्या पूंजी की कमी है. अधिकांश परिवारों को बांस खरीदने के लिए छह महीने पहले ही स्थानीय महाजनों या व्यापारियों से अग्रिम पूंजी लेनी पड़ती है. छठ पूजा के समय तैयार माल इन्हीं महाजनों को थोक भाव में बेचना पड़ता है, जो बाजार दर से आधे दामों में खरीद लेते हैं. इससे व्यापारियों को भारी मुनाफा होता है, जबकि कारीगरों को सीमित आमदनी पर ही संतोष करना पड़ता है. मोहली परिवारों का कहना है कि यदि सरकार या स्वयं सहायता समूहों से सस्ती पूंजी उपलब्ध हो जाए तो वे बिना किसी बिचौलिये के सीधे बाजार तक अपनी वस्तुएं पहुंचा सकते हैं. इससे उनकी आमदनी दुगनी हो सकती है और परंपरागत कला को भी बढ़ावा मिलेगा. डाभाकेंद, चंपापुर और आशाडीह के मोहली परिवार अपनी मेहनत और कारीगरी से न केवल अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं, बल्कि बांस की बनी वस्तुओं के माध्यम से झारखंड की पारंपरिक हस्तकला को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान भी दिला रहे हैं.

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