jamshedpur news : न्यूक्लियर रेडिएशन और केमिकल का कॉकटेल पांच साल कम कर रहा है आयु : प्रो. अवधेश एन झा

जमशेदपुर (फाइल फोटो)
जमशेदपुर को-ऑपरेटिव कॉलेज में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन
जमशेदपुर को-ऑपरेटिव कॉलेज में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन
jamshedpur news :
पूरी दुनिया में रिन्युएबल एनर्जी व न्यूक्लियर एनर्जी को बढ़ावा दिया जा रहा है. फ्यूजन टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से ऊर्जा तैयार करने की दिशा में रिसर्च एंड डेवलपमेंट किया जा रहा है. लेकिन, इसमें सबसे अधिक खतरनाक है न्यूक्लियर एनर्जी बनने के बाद वेस्ट मटीरियल ( ट्रिटियम ) का भंडारण करना. यह काफी खतरनाक होता है. फुकुशिमा दाईची के एक मिलियन टन रेडियोएक्टिव वॉटर को वर्ष 2011 से 2023 तक संरक्षित कर रखा गया था. 2023 से इसे धीरे-धीरे समुद्र में रिलीज करना शुरू हुआ. 30 साल में इसे धीरे-धीरे रिलीज किया जायेगा. इसमें मुख्य रूप से ट्रिटियम है. इसका चाइना के साथ ही कोरिया व खुद जापान के मछुआरे विरोध कर रहे हैं. कारण है कि इसका कुप्रभाव ना सिर्फ जलीय जीव, बल्कि मनुष्य पर भी पड़ेगा. यह बातें गुरुवार को जमशेदपुर को-ऑपरेटिव कॉलेज में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में यूके के प्लायमाउथ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अवधेश एन झा ने कहीं.उन्होंने कहा कि न्यूक्लियर रेडिएशन (आयनाइजिंग रेडिएशन), पेस्टीसाइड्स (कीटनाशक), इंसेक्टिसाइड्स (कीटाणुनाशक, जो पेस्टीसाइड्स का सबसेट हैं) और फार्मास्युटिकल्स (दवाएं) का कॉकटेल सीधे मनुष्य के जीवन अवधि पर पड़ेगा. इसके अत्यधिक या अनियंत्रित इस्तेमाल से गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं. ये कैंसर, न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियां (जैसे अल्जाइमर, पार्किंसन), हृदय रोग, युवाओं में भी प्रजनन समस्याएं और अन्य पुरानी बीमारियां बढ़ाते हैं. अगर इस कॉकटेल का इस्तेमाल संतुलित तरीके से नहीं किया गया, तो पांच साल तक का आयु कम होना तय है. तरह-तरह की बीमारियों के शिकार हो सकते हैं. इसलिए इसके फायदे हैं, तो नुकसान भी काफी अधिक हैं. इसलिए इनके जोखिमों को नियंत्रित करना जरूरी है. प्रोफेसर अवधेश एन झा ने कहा कि दुनिया में न्यूक्लियर एनर्जी की डिमांड लगातार बढ़ रही है. इंग्लैंड में 20 प्रतिशत, फ्रांस में 80 प्रतिशत, जबकि वैश्विक रूप से 30 प्रतिशत न्यूक्लियर एनर्जी का इस्तेमाल हो रहा है. लेकिन, इसमें सबसे बड़ा खतरा यह है कि इस एनर्जी को तैयार करने में वेस्ट मटीरियल के रूप में जो ट्रिटियम तैयार हो रहा है, उसकी मात्रा अन्य रेडियोएक्टिव सबस्टेंस से कहीं ज्यादा है. फ्यूजन टेक्नोलॉजी से एनर्जी सिक्योरिटी तो मिलेगी, लेकिन पर्यावरणीय प्रभाव का पूरा आकलन जरूरी है. उन्होंने कहा कि ट्रिटियम का स्टोरेज मुश्किल है लेकिन ऑर्गेनिकली बाउंड ट्रिटियम का बायोएक्यूमुलेशन, बायोमैग्निफिकेशन और फूड चेन रिस्क पर और रिसर्च चाहिए. लैब स्टडीज पर्याप्त नहीं है.
डिफेंस प्राइमिंग तकनीक से फसलें रहेंगी सुरक्षित, मिट्टी भी होगी उपजाऊ : डॉ प्रशांत सिंह
सेमिनार में खेती से जुड़ी एक नयी और उपयोगी तकनीक की जानकारी दी गयी, जिससे फसलों को बीमारियों से बचाया जा सकता है और खेतों की मिट्टी भी खराब नहीं होगी. इस तकनीक का नाम डिफेंस प्राइमिंग है. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के वैज्ञानिक डॉ प्रशांत सिंह ने बताया कि इस तकनीक में रासायनिक दवाओं की जगह सूक्ष्मजीवों से बने एक घोल का इस्तेमाल किया जाता है. यह घोल पौधों की प्राकृतिक रोग-प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है, जिससे पौधे खुद ही बीमारियों और सूखे जैसी समस्याओं से लड़ पाते हैं. डॉ प्रशांत ने कहा कि आज जलवायु परिवर्तन और जरूरत से ज्यादा रसायनों के कारण खेती मुश्किल होती जा रही है. रासायनिक खाद और कीटनाशक मिट्टी को नुकसान पहुंचा रहे हैं. ऐसे में डिफेंस प्राइमिंग एक सुरक्षित विकल्प है. उन्होंने बताया कि इस शोध में किसी भी तरह के कीटनाशक या फफूंदनाशक का उपयोग नहीं किया गया, फिर भी पौधे स्वस्थ रहे. बीजों को बोने से पहले थोड़ी मात्रा में यह सूक्ष्मजीवी घोल लगाया गया. यह तकनीक न केवल फसलों की सुरक्षा करेगी, बल्कि उत्पादन भी बढ़ायेगी और किसानों की आमदनी में सुधार लायेगी. सबसे खास बात यह है कि इसका असर आने वाली पीढ़ियों की फसलों पर भी रहेगा.तकनीकी सत्र-1
इस सत्र में दो मुख्य पेपर प्रेजेंट किये गये. डॉ अवधेश एन झा (यूनिवर्सिटी ऑफ प्लायमाउथ, यूनाइटेड किंगडम) ने ट्राइटियम रेडियोन्यूक्लाइड के पर्यावरणीय और एपिजेनेटिक प्रभाव पर अपना प्लेनरी लेक्चर दिया. प्रो डीके सिंह (कुलपति, एनपीयू, पलामू) ने कृषि उत्पादकता को तीन गुना बढ़ाने के नये आयाम पर अपनी बातों को रखा. आमंत्रित वक्ताओं में डॉ एचपी गुरुशंकरा (केंद्रीय विश्वविद्यालय, केरल) ने डाउन सिंड्रोम से जुड़ी ल्यूकेमिया के महामारी विज्ञान और आनुवंशिक हस्ताक्षर पर चर्चा की. डॉ राम प्रसाद (एमजीसीयू, मोतिहारी) ने एंडोफाइटिक फंगस के माध्यम से टिकाऊ पौध उत्पादकता के संभावित तरीकों पर चर्चा की. इस सत्र में डॉ बिरजालक्ष्मी दास व डॉ नंद जी कुमार उपस्थित थे.तकनीकी सत्र- 2
इस सत्र का विषय इम्यूनोमॉड्यूलेशन और मानव स्वास्थ्य रहा, जिसकी अध्यक्षता डॉ अवधेश एन झा ने की. बीएचयू के डॉ प्रशांत सिंह ने पौधों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और सतत कृषि पर प्रकाश डाला. वहीं, एसआरएम मेडिकल कॉलेज के डॉ कौस्तव सरकार ने हृदय रोग और कैंसर के बीच आनुवांशिक संबंधों की व्याख्या की. पीजीआइएमइआर चंडीगढ़ के डॉ गौरव शर्मा ने स्टेम सेल ट्रांसप्लांट में एचएलए जीन की भूमिका पर चर्चा की.तकनीकी सत्र- 3
इस सत्र में सिंगापुर के प्रो डॉ एम प्रकाश हांडे ने नैनो कणों की विषाक्तता और कैंसर उपचार में उनकी उपयोगिता पर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की. इस सत्र में स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़ी वैश्विक चुनौतियों के समाधान की दिशा में कई बातें की गयी.प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए




