मुंद्रा पोर्ट पहुंचते ही जमशेदपुर के फौलादी बेटे अंश ने मां को किया फोन, बोला- मां, मैं लौट आया

मुंद्रा पोर्ट में शिवालिक पर टीम के साथ अंश (बाएं ऊपर), टीवी पर समाचार देखते माता-पिता (बाएं नीचे) और शिपिंग कॉरपोरेशन के ऑफिस में अधिकारियों के साथ अंश (दाएं). फोटो: प्रभात खबर
Jamshedpur News: झारखंड की लौहनगरी जमशेदपुर के इंजीनियर अंश त्रिपाठी ने होर्मुज जलडमरूमध्य के खतरनाक हालात से सुरक्षित निकलकर मुंद्रा पोर्ट पहुंचते ही मां को फोन कर अपनी सलामती की खबर दी. उनकी बहादुरी, परिवार की भावनाएं और देशसेवा की प्रेरणादायक कहानी हर किसी को गर्व और राहत से भर देती है. इससे संबंधित पूरी खबर नीचे पढ़ें.
जमशेदपुर से अशोक झा की रिपोर्ट
Jamshedpur News: जब हौसला फौलादी हो और इरादे नेक हों, तो समंदर की लहरें भी रास्ता दे देती हैं. खाड़ी देशों के युद्धग्रस्त जलक्षेत्र (होर्मुज जलडमरूमध्य) में मौत को मात देकर जमशेदपुर के होनहार लाल और शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया के सेकंड इंजीनियर अंश त्रिपाठी आखिरकार सुरक्षित भारतीय सीमा में दाखिल हो ही गए. भारत के मुंद्रा पोर्ट पर पहुंचते ही उन्होंने सबसे पहले अपनी मां चंद्रा त्रिपाठी को फोन किया और कहा, ‘मां, मैं लौटा आया और सुरक्षित हूं.’
पहली कॉल, ‘मां, पहुंच गया हूं, अभी थोड़ा काम है’
जैसे ही अंश का विशालकाय जहाज ‘शिवालिक’ गुजरात के मुंद्रा बंदरगाह की सीमा में पहुंचा और नेटवर्क मिला, अंश ने सबसे पहले अपनी मां चंदा त्रिपाठी को फोन लगाया. यह वही पल था, जिसका इंतजार परिवार समेत पूरे जमशेदपुर को था. पूरा परिवार पिछले कई दिनों से सांसें रोककर कर रहा था. अंश ने छोटी बात की, लेकिन पूरी मजबूती के साथ कहा , “मां, मैं भारत पहुंच गया हूं और पूरी तरह सुरक्षित हूं. अभी जहाज कुछ तकनीकी कामों में व्यस्त हूं. जैसे ही फ्री होता हूं, तुमसे लंबी बात करूंगा. बेटे की यह चंद लाइनें मां के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं थीं.
घर में जश्न का माहौल: टल गयी ‘अग्निपरीक्षा’
अंश की सुरक्षित वापसी से पारडीह स्थित उनके निवास ‘आशियाना वुडलैंड’ में उत्सव जैसा माहौल है. यूसीआईएल सेवानिवृत्त उप-प्रबंधक और अंश के बुजुर्ग पिता मिथिलेश कुमार त्रिपाठी जो आंखें कल तक नम पड़ी थीं, बेटे की आवाज सुनकर अब उनमें चमक आ गई है.
मां की दुआएं आईं काम
अंश की आवाज सुनकर मां चंदा त्रिपाठी भावुक हो गईं. खुशी से उनकी आंखों में आंसू आ गए. रूंधे गले से उन्होंने कहा, “बेटे की आवाज सुनकर ऐसा लगा, जैसे खोई हुई सांसें वापस आ गईं. उसने कहा कि वह व्यस्त है, पर उसकी आवाज की खनक बता रही थी कि मेरा शेर सुरक्षित लौट आया है.
पत्नी को पति पर है पूरा भरोसा
टाटा स्टील में सीए के पद पर कार्यरत पत्नी चंदा मिश्रा त्रिपाठी ने इसे ईश्वर और भारत सरकार की कूटनीति की जीत बताया. अब पूरा परिवार अंश के जमशेदपुर में कदम रखने का इंतजार कर रहा है. चंदा मिश्रा त्रिपाठी को अपने पति पर पूरा भरोसा है.
अंश की नसों में दौड़ता है देशसेवा का जज्बा
जमशेदपुर के जांबाज इंजीनियर अंश त्रिपाठी का साहस और सूझबूझ उन्हें विरासत में मिली है. अंश के पिता मिथिलेश कुमार त्रिपाठी देश के उन चुनिंदा सपूतों में शामिल हैं, जिन्होंने अपनी जिंदगी के सुनहरे साल मां भारती की रक्षा में समर्पित किए हैं.
मिथिलेश त्रिपाठी ने भारतीय वायुसेना में एक गौरवशाली पारी खेली. सीमाओं की सुरक्षा और आसमान की ऊंचाइयों में देश का मान बढ़ाने के बाद वे वहां से सेवानिवृत्त हुए. यही कारण है कि जब अंश होर्मुज की लहरों के बीच युद्ध के तनाव से जूझ रहे थे, तो एक सैनिक पिता का दिल धड़कने के साथ-साथ बेटे के कर्तव्य के प्रति दृढ़ भी था.
वायुसेना से अपनी सेवा पूरी करने के बाद उन्होंने अपनी तकनीकी विशेषज्ञता और अनुशासन का लाभ यूरेनियम कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड को दिया.वे दशकों तक देश की रक्षा और औद्योगिक प्रगति में योगदान देने के बाद साल 2020 में सेवानिवृत्त हुए.
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मेरे अपने बेटे पर गर्व है: मिथिलेश
अंश के पिता मिथिलेश कुमार त्रिपाठी कहते हैं, “मैंने वर्दी पहनी और देश की सेवा की. आज मेरा बेटा समंदर के बीच से देश के लिए ‘ऊर्जा’ (गैस) लेकर आ रहा है. एक सैनिक पिता के लिए इससे बड़े गर्व की बात और क्या हो सकती है कि उसका बेटा भी राष्ट्र की सेवा के मिशन पर है.”
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लेखक के बारे में
By KumarVishwat Sen
कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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