मौजूदा एजुकेशन सिस्टम की सर्जरी करेगी नयी शिक्षा नीति, जमशेदपुर में बोले अंतरिक्ष वैज्ञानिक डॉ के कस्तूरीरंगन
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 19 Oct 2019 2:15 PM
जमशेदपुर : भारत में मौजूदा शिक्षा नीति में कई खामियां हैं. हालत यह है कि देश में ऐसे लोगों के पास भी बीए, बीएससी, एमकॉम, बीएड, बीटेक, एमबीए, नेट जैसी डिग्री मौजूद हैं, जिन्होंने आज तक कॉलेज का क्लास रूम भी नहीं देखा. डिग्री लेकर वे घूम रहे हैं. सरकारी स्कूलों में भी विचित्र स्थिति […]
जमशेदपुर : भारत में मौजूदा शिक्षा नीति में कई खामियां हैं. हालत यह है कि देश में ऐसे लोगों के पास भी बीए, बीएससी, एमकॉम, बीएड, बीटेक, एमबीए, नेट जैसी डिग्री मौजूद हैं, जिन्होंने आज तक कॉलेज का क्लास रूम भी नहीं देखा. डिग्री लेकर वे घूम रहे हैं.
सरकारी स्कूलों में भी विचित्र स्थिति है. कई स्कूल सिंगल टीचर स्कूल हैं. एक ही टीचर बच्चों को गणित से लेकर इतिहास तक पढ़ा रहा है. कहीं स्कूल में टीचर हैं, लेकिन बच्चे डबल डिजिट में भी नहीं हैं. यह कहना है अंतरिक्ष वैज्ञानिक और नयी शिक्षा नीति का ड्राफ्ट तैयार करने वाली टीम के अध्यक्ष डॉ के कस्तूरीरंगन का.
अंतरिक्ष वैज्ञानिक डॉ कस्तूरीरंगन ने कहा कि इस प्रकार के एजुकेशन सिस्टम की बड़े पैमाने पर सर्जरी की जरूरत है. इसके लिए वर्ष 2016 से नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति तैयार की जा रही थी. नयी शिक्षा नीति का ड्राफ्ट सरकार को सौंप दिया गया है. सरकार फिलहाल ड्राफ्ट को रिव्यू कर रही है. उम्मीद है कि अगले वर्ष तक उसे लागू कर दिया जायेगा.
डॉ कस्तूरीरंगन ने शनिवार को जमशेदपुर के जुस्को स्कूल कदमा में आयोजित एक समारोह के दौरान शहर के शिक्षाविदों को संबोधित किया. कहा कि नयी शिक्षा नीति का जो ड्राफ्ट उन्होंने तैयार किया है, उसमें 80 से 90 फीसदी समस्याओं का समाधान हो जायेगा. साथ ही कहा कि नयी शिक्षा नीति को फ्लेक्सिबल बनाया गया है.
श्री कस्तूरीरंगन ने कहा कि इसमें पारदर्शिता ऐसी होगी कि दिल्ली या देश के किसी भी कोने में बैठकर किसी स्कूल के सतत विकास व वहां के बच्चों की शैक्षणिक गुणवत्ता को आसानी से मॉनिटर किया जा सकेगा. कहा कि नयी शिक्षा नीति ऐसी है कि स्कूली बच्चों के बस्ते का बोझ आधा हो जायेगा.
उन्होंने कहा कि साथ ही देश के हर जिले में कम के कम एक अॉटोनोमस डिग्री कॉलेज जरूर हो, ऐसा प्रावधान किया जा रहा है. शिक्षा नीति को इस प्रकार से तैयार किया जा रहा है, जिसका फायदा कम से कम अगले 20 वर्षों तक होगा.
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