स्कूलों का सर्वे झूठा, किराया वाजिब रहे तो पैरेंट्स बस से ही बच्चों को भेजने के पक्षधर

Updated at : 07 Aug 2018 6:32 AM (IST)
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स्कूलों का सर्वे झूठा, किराया वाजिब रहे तो पैरेंट्स बस से ही बच्चों को भेजने के पक्षधर

जमशेदपुर : स्कूलों बच्चों की सुरक्षा को लेकर सोमवार को प्रशासन हरकत में आ गया. अलग-अलग थाना क्षेत्रों में अभियान चलाकर असुरक्षित रूप से बच्चों को ले जाने वाले स्कूली अॉटो व वैन को पकड़ा गया. पुलिस द्वारा पकड़े जाने पर ऑटो व वैन चालकों का तर्क था कि पैरेंट्स की जिद की वजह से […]

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जमशेदपुर : स्कूलों बच्चों की सुरक्षा को लेकर सोमवार को प्रशासन हरकत में आ गया. अलग-अलग थाना क्षेत्रों में अभियान चलाकर असुरक्षित रूप से बच्चों को ले जाने वाले स्कूली अॉटो व वैन को पकड़ा गया. पुलिस द्वारा पकड़े जाने पर ऑटो व वैन चालकों का तर्क था कि पैरेंट्स की जिद की वजह से अोवरलोडिंग की स्थिति बनी है.
इस मामले में प्रभात खबर ने अभिभावकों की मन की बात जानने का प्रयास किया. प्रभात खबर की अोर से असुक्षित नौनिहाल थीम पर आयाेजित परिचर्चा में अलग-अलग क्षेत्र के उन अभिभावकों ने हिस्सा लिया, जिनके बच्चे अॉटो या वैन में स्कूल जाते हैं. अभिभावकों ने एक सुर में कहा कि वह जानते हैं कि उनके बच्चे अॉटो व वैन में असुरक्षित हैं.
डीसी ने सभी स्कूलों को बस चलाने का आदेश देकर अच्छी पहली की थी, लेकिन निजी स्कूल प्रबंधन सर्वे कराकर यह बताने लगे कि पैरेंट्स ही नहीं चाहते कि बच्चे बस से जायें. अभिभावकों के अनुसार स्कूल प्रबंधन द्वारा किया गया सर्वे गलत है. अभिभावकों ने बस से बच्चों को भेजने का समर्थन किया.
समस्या
1. अॉटो तीनों तरफ से खुला रहता है, हल्का सा ब्रेक अथवा झटका लगने पर ही बच्चा असंतुलित होकर गिर जाता है.
2. स्कूलों में चलाये जाने वाली स्कूल वैन कंडम हैं. करीब 30 साल पुरानी वैन अब भी चलायी जा रही है.
3. घायल बच्चे को वैन में बैठकर घूमाते रहे, अस्पताल नहीं पहुंचाया. यह ड्राइवर की अशिक्षा व मानवता की कमी प्रदर्शित करती है.
4. स्कूल प्रबंधन द्वारा जो बस का किराया तय किया गया है वह बहुत ज्यादा है.
5. जिला प्रशासन तभी सक्रिय होता है जब कोई घटना घट जाती है. पूर्व की कोई तैयारी नहीं होती है, ताकि गड़बड़ी
न हो.
समाधान
1. अॉटो में तीनों तरफ से जाली हो, आगे की सीट पर बैठाना प्रतिबंधित हो. अोवरलोड करने वाले को जेल भेजा जाये.
2. जिला प्रशासन सख्ती दिखाये अौर स्कूल को हर हाल में बस चलाने को कहे. सिर्फ आइवॉश के लिए 1-2 बस चलाना समाधान नहीं है.
3. जिला प्रशासन ही त्रिपक्षीय वार्ता करे अौर बस का किराया तय करे. प्रशासन द्वारा किराया तय करने पर बस संचालन में अभिभावकों का समर्थन मिलेगा.
4. हर स्कूल में अभिभावकों का एक वाट्सएप ग्रुप बने. जो यह तय करे कि अगर किसी भी अॉटो या वैन में क्षमता से ज्यादा बच्चे या फिर असुरक्षित तरीके से बच्चे हैं तो उसकी फोटो लेकर ग्रुप में डाले ताकि अभिभावक दुबारा उस वैन में अपने बच्चे को न भेजें. स्कूल वैन अौर अॉटो के पीछे एक नंबर भी हो ताकि ज्यादा स्पीड से चलाने पर उसकी शिकायत सही फोरम पर हो सके.
5. जिला प्रशासन द्वारा एक नोडल पदाधिकारी के नेतृत्व में उड़न दस्ता टीम का गठन किया जाये, जो अौचक निरीक्षण कर नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई करे.
कहीं कंडम टायर, तो कई की खिड़की में जाली नहीं
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