आदिवासी संताल समाज के परंपरा के विपरित पवित्र जल अर्पित कर श्राद्धकर्म को संपन्न कराया

Published by : Dashmat Soren Updated At : 10 Jun 2024 6:44 PM

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श्राद्धकर्म संस्कार को करते परिवार के लोग

सेंगेल दिशोम परगना सोनाराम सोरेन के नेतृत्व में प्रो. बहादुर हांसदा के अनुज स्व. सुनाराम हांसदा का श्राद्धकर्म संपन्न कराया गया. आदिवासी संताल समाज की परंपरा से अलग हटकर पवित्र जल अर्पित कर श्राद्धकर्म को संपन्न कराया गया.

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जमशेदपुर: जमशेदपुर के करनडीह बोदराटोला में सेंगेल दिशोम परगना सोनाराम सोरेन के नेतृत्व में प्रो. बहादुर हांसदा के अनुज स्व. सुनाराम हांसदा का श्राद्धकर्म संपन्न कराया गया. आदिवासी संताल समाज की परंपरा से अलग हटकर पवित्र जल अर्पित कर श्राद्धकर्म को संपन्न कराया गया. सुनाराम हांसदा का निधन 9 मई को हुआ था. श्राद्धकर्म को संपन्न कराने में सोनाराम सोरेन, जूनियर मुर्मू, बिमो मुर्मू, बिरसा मुर्मू, किसुन हांसदा, ईश्वर सोरेन, सोनोत बास्के, माझी सोरेन, कुनूराम बास्के, जोबारानी बास्के, चिंतामाणी मुर्मू, छिता मुर्मू, सीतामनी हांसदा, बुढान हांसदा, पिथो हांसदा, बहादुर हांसदा, बैजनाथ हांसदा, अर्जुन मुर्मू, मार्शाल टुडू, सेंगेल सांग्राम हांसदा, ओडिशा प्रदेश सेंगेल परगना काडूराम मुर्मू, नारान मुर्मू, धनेश्वर हांसदा, आनंद हांसदा, असम के पांडूराम मुर्मू, रोबिन बास्के, आदि ने सराहनीय योगदान दिया. सोमवार को करनडीह पवित्र जल अर्पण से हुई श्राद्धकर्म की समीक्षा की गयी. उनका कहना है कि समाज में सुधार व क्रांति लाने के लिए गलत चीजों को छोड़ने की जरूरत है. अन्यथा समाज अंधविश्वास से बाहर नहीं निकल पायेगा और समाज का विकास संभव नहीं होगा. समीक्षा बैठक में सेंगेल दिशोम परगना सोनाराम सोरेन, बिमो मुर्मू, जूनियर मुर्मू, छिता मुर्मू, अर्जुन मुर्मू, मुनीराम हेंब्रम आदि मौजूद थे.

संताल समाज में पूजा अर्चना में होती है हंडिया का व्यवहार
संताल समाज में जन्म लेने से लेकर मृत्यु तक के हर संस्कार में चावल से बने हंडिया का व्यवहार होता है. या यूं कहें कि हंडिया के बिना कोई भी पूजन व सामाजिक संस्कार नहीं होता है. आदिवासी स्वशासन व्यवस्था के प्रमुख आज भी पूर्वजों के बनाये नीति-नियम, संस्कार व विधि के अनुरूप ही चल रहे हैं. वे पूर्वजों के बनाये रास्ते पर ही चलना चाहते हैं. उनका मानना है कि पूर्वजों के बनाये नीति-नियम व सामाजिक संस्कार को बचाये रखने उनकी नैतिक जिम्मेदारी है. पूर्वजों के नीति-नियम व संस्कार में कोई दोष नहीं है. उन्हीं नीति-नियम व संस्कार के बदौलत ही आज तक संताल समाज बचा हुआ है. लेकिन नीति-नियम व संस्कार का दुरूपयोग हो रहा है. इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता है. पूजा के रूप में व्यवहार होने वाले हंडिया को लोग दैनिक जीवन में नशा के रूप में कर रहे हैं. नशा के रूप में हंडिया का व्यवहार होने से यह समाज को पीछे धकेलने का काम कर रहा है.

सलखान मुर्मू के नेतृत्व में चलाया जा रहा है समाज सुधार आंदोलन
आदिवासी सेंगेल अभियान के राष्ट्रीय अध्यक्ष सह पूर्व सांसद सालखन मुर्मू के नेतृत्व में आदिवासी समाज को अंधविश्वास व महिला विरोधी मानसिकता जैसे समस्या से उबारने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अभियान चलाकर लोगों को जागरूक किया जा रहा है. इसी क्रम में शादी, विवाह, जन्मदिन, छटियारी समेत अन्य आयोजनों व संस्कारों में हंडिया का व्यवहार पर परहेज करने का कहा जा रहा है. क्योंकि उनका मानना है कि हंडिया का सेवन समाज को पीछे धकेलने का काम कर रहा है. कई लोग सलखान मुर्मू के बताये व दिखाये राह पर चल रहे हैं. वहीं कई लोग पूर्वजों के बनाये राह पर ही चलना चाहते हैं. बताते चलें कि कई बार पुराने सामाजिक व्यवस्था व नयी सामाजिक व्यवस्था को लेकर झड़प वाली स्थिति तक आ चुकी है. इसलिए समाज के बुद्धिजीवी व शिक्षाविद को उक्त मुद्दे पर चिंतन-मंथन कर हल निकालना चाहिए. ताकि लोगों के बीच आपसी भाईचारा बनी रहे.

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