हजारीबाग के सरकारी स्कूलों में एडमिशन और अटेंडेंस रजिस्टर खरीदारी नहीं, 1457 विद्यालय फंड से वंचित

रांची स्थित झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद का कार्यालय. फोटो: प्रभात खबर
Hazaribagh News: हजारीबाग के 1457 सरकारी स्कूलों को अब तक विद्यालय विकास कोष नहीं मिला है, जिससे नामांकन और उपस्थिति पंजी की खरीदारी प्रभावित हुई है. नए सत्र से पहले शिक्षक परेशान हैं और एक लाख छात्रों की पढ़ाई पर असर पड़ रहा है, वहीं स्वच्छता और जरूरी संसाधन भी बाधित हैं. इससे संबंधित पूरी खबर नीचे पढ़ें.
हजारीबाग से आरिफ की रिपोर्ट
Hazaribagh News: झारखंड के हजारीबाग जिले में सरकारी स्कूलों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है. जिले के 1457 प्रारंभिक स्कूलों (कक्षा 1 से 8 तक) को अब तक स्कूल डेवलपमेंट फंड का पैसा नहीं मिला है. इससे स्कूलों में एडमिशन और अटेंडेंस रजिस्टर की खरीदारी नहीं की जा सकी है. यह आलम तब बना हुआ है, जब 1 अप्रैल 2026 से सूबे के सभी सरकारी स्कूलों में नए सत्र की शुरुआत होगी. स्कूलों के लिए चिंता का विषय यह बना हुआ है कि पैसों के अभाव में बच्चों के एडमिशन और उनकी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए रजिस्टरों का इंतजाम कैसे होगा?
नया सत्र शुरू होने से पहले बढ़ी चिंता
हर साल झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद (रांची) की ओर से समग्र शिक्षा अभियान के तहत मार्च महीने की शुरुआत में स्कूल डेवलपमेंट फंड जारी कर दिया जाता है. इसका उद्देश्य स्कूलों में जरूरी शैक्षणिक सामग्री की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करना होता है. लेकिन, मार्च 2026 खत्म होने को है और 1 अप्रैल से नया सत्र शुरू होने वाला है. इसके बावजूद फंड नहीं मिलने से स्कूलों के प्रभारी और शिक्षक चिंतित हैं.
एडमिशन और अटेंडेंस रजिस्टर की नहीं हो रही खरीदारी
नए सत्र में छात्रों के एडमिशन के लिए एडमिशन रजिस्टर और रोजाना अटेंडेंस दर्ज करने के लिए अटेंडेंस रजिस्टर की जरूरत होती है. लेकिन, फंड के अभाव में इनकी खरीदारी नहीं हो सकी है. इसके अलावा, चॉक और डस्टर जैसी जरूरी शिक्षण सामग्री भी स्कूलों में उपलब्ध नहीं है. कई शिक्षक जुगाड़ के जरिए किसी तरह पढ़ाई जारी रखने की कोशिश कर रहे हैं.
एक लाख छात्रों की पढ़ाई पर असर
फंड की कमी का सीधा असर जिले के लगभग एक लाख छात्रों पर पड़ रहा है. पठन-पाठन की मूलभूत सामग्री के अभाव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना मुश्किल हो गया है. शिक्षकों का कहना है कि अगर समय पर राशि नहीं मिली, तो नए सत्र की शुरुआत ही अव्यवस्था के साथ होगी.
स्वच्छता व्यवस्था भी ठप
स्कूल डेवलपमेंट फंड का 10 प्रतिशत हिस्सा स्कूलों की स्वच्छता व्यवस्था पर खर्च करने का प्रावधान है. लेकिन राशि नहीं मिलने से स्कूलों में साफ-सफाई का काम प्रभावित हो रहा है. इसके अलावा, पेयजल व्यवस्था की देखरेख नहीं हो पा रही और शौचालयों की नियमित सफाई बाधित है. इससे छात्रों के स्वास्थ्य पर भी खतरा बढ़ गया है.
छात्रों की संख्या के अनुसार मिलता है फंड
विद्यालय विकास कोष की राशि स्कूलों को छात्रों की संख्या के आधार पर दी जाती है.
- 100 छात्रों तक: 25 हजार रुपये
- 101 से 200 छात्र: 50 हजार रुपये
- 201 से 300 छात्र: 75 हजार रुपये
यह राशि स्कूल की विद्यालय प्रबंधन समिति (एसएमसी) के खाते में भेजी जाती है. इसके बाद समिति के अध्यक्ष और शिक्षक (पदेन सचिव) मिलकर इस राशि का उपयोग करते हैं.
विभाग की चुप्पी से उठ रहे सवाल
फंड जारी नहीं होने को लेकर शिक्षा विभाग की चुप्पी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. स्कूल स्तर पर लगातार समस्याएं बढ़ रही हैं, लेकिन समाधान की दिशा में कोई स्पष्ट पहल नजर नहीं आ रही है. शिक्षकों का कहना है कि समय पर फंड नहीं मिलने से शिक्षा व्यवस्था प्रभावित हो रही है, जिसका खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ रहा है.
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क्या कहते हैं अधिकारी
जिला शिक्षा पदाधिकारी (डीईओ) प्रवीण रंजन ने बताया कि माध्यमिक स्कूलों (कक्षा 9 से 12) को स्कूल डेवलपमेंट के पैसे मिल चुके हैं. उन्होंने कहा कि प्रारंभिक स्कूलों को भी जल्द ही फंड जारी कर दिया जाएगा, ताकि स्कूलों में जरूरी व्यवस्थाएं बहाल हो सकें.
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लेखक के बारे में
By KumarVishwat Sen
कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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