अगले 35 साल तक चलेगी कोलियरी
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :08 Dec 2016 12:40 AM (IST)
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उरीमारी : हजारीबाग जिले में अवस्थित सीसीएल बरका-सयाल क्षेत्र की सबसे बड़ी परियोजनाओं में गिने जानेवाली उरीमारी ओसीपी से अगले 35 वर्षों तक वन भूमि पर कोयला उत्खनन के लिए बुधवार को ग्राम सभा में वन भूमि अपयोजन की मंजूरी बड़कागांव की सीओ सह बीडीओ अलका कुमारी, प्रमुख राजमुनी देवी और उरीमारी व पोटंगा के […]
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उरीमारी : हजारीबाग जिले में अवस्थित सीसीएल बरका-सयाल क्षेत्र की सबसे बड़ी परियोजनाओं में गिने जानेवाली उरीमारी ओसीपी से अगले 35 वर्षों तक वन भूमि पर कोयला उत्खनन के लिए बुधवार को ग्राम सभा में वन भूमि अपयोजन की मंजूरी बड़कागांव की सीओ सह बीडीओ अलका कुमारी, प्रमुख राजमुनी देवी और उरीमारी व पोटंगा के विस्थापित ग्रामीणों की उपस्थिति में मिल गयी. कुल 455.31 हेक्टेयर वन भूमि में जंगल-झाड़ी भूमि शामिल है.
बताया गया कि इस भूमि के अपयोजन के लिए दस्तावेज वन विभाग हजारीबाग में जमा है. इसे एफआरए व एनओसी के लिए ग्राम सभा में मंजूरी मिलनी जरूरी थी. ग्राम सभा में पीओ प्रशांत वाजपेयी, एसओ पीएंडपी डीके राम, वीके सिंह, डीएन प्रसाद, सीआइ मधुसूदन सिंह, पोटंगा मुखिया पारो देवी, उरीमारी मुखिया कमला देवी, पंसस कानू मांझी, पंसस कार्तिक उरांव, पंसस सुमन कुमारी, श्रमिक नेता राजू यादव प्रमुख रूप से उपस्थित थे.
तीन वर्ष में बंद हो जाता उरीमारी
वर्तमान में बरका-सयाल क्षेत्र की सबसे बड़ी उत्पादन करने वाली उरीमारी परियोजना अगले तीन वर्षों में भूमि की कमी के कारण बंद होने के कगार पर खड़ी थी. चालू वित्तीय वर्ष में किसी तरह गंधौनिया पैच में उत्खनन किया जा रहा है. यहां से पांच लाख टन कोयला निकालने का लक्ष्य रखा गया है. बताया गया कि ग्राम सभा में पास हुए 455.31 हेक्टेयर वन भूमि एक-डेढ़ वर्ष के अंदर भारत सरकार के वन मंत्रालय द्वारा परियोजना को उत्खनन के लिए हस्तांतरित कर दिया जायेगा.
प्रतिवर्ष दो मिलियन टन होगा उत्पादन
455.31 हेक्टेयर वन भूमि मिल जाने के बाद यहां से अगले 35-40 वर्षों तक परियोजना की लाइफ बढ़ जायेगी. इस वन भूमि के नीचे करीब 70 मिलियन टन कोयले का भंडार है.
यहां से प्रतिवर्ष दो मिलियन टन कोयला का उत्पादन शुरू किया जायेगा. बताना उचित होगा कि वर्ष 1974 में इस परियोजना को चालू करने के लिए 1034.80 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया गया था, जो उरीमारी, पोटंगा व असवा में अवस्थित है. वर्ष 1982 में इस परियोजना को शुरू किया गया था. यहां से 1.30 मिलियन टन कोयले का उत्पादन होता था. बाद में वर्ष 2009 में इसे 1.3 से बढ़ाकर दो मिलियन टन कोयले का उत्पादन शुरू किया गया था, जिसकी अवधि 10 वर्ष निर्धारित की गयी थी. यह अवधि 2019 तक थी.
विस्थापितों ने सुनायी दर्द
ग्राम सभा में पोटंगा व उरीमारी के विस्थापित ग्रामीणों ने अपना दर्दखुलकर सुनाया. विस्थापितों ने कहा कि प्रबंधन द्वारा शुरू में हमलोगों की जमीन नौकरी, मुआवजा व रोजगार के नाम पर ले लिया जाता है.
लेकिन हमलोग बुनियादी विकास से भी वंचित हैं. प्रबंधन पूर्व में अधिग्रहित की गयी जमीन के बदले बकाया नौकरी, मुआवजा व पुनर्वास प्रदान करने का काम करे. पंचायतों के विकास के लिए एनओसी दे. साथ ही वन भूमि का जोत-आबाद व दखल-दहानी जमीन के बदले मुआवजा, नौकरी देने का काम करे. इस पर सीओ बड़कागांव ने तत्काल कैंप लगा कर ग्रामीणों से जमीन संबंधी दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा. कहा कि विस्थापितों की आवाज को प्रबंधन सुनने का काम करे.
जबकि प्रखंड प्रशासन जमीन संबंधी मामलों का निबटारा दस्तावेजों के आधार पर तत्काल करके उन्हें न्याय दिलाने का काम करेगा. मौके पर कौलेश्वर गंझू, दसई मांझी, धर्मदेव करमाली, महादेव बेसरा, मोतीलाल मांझी, विश्वनाथ मांझी, मोहन सोरेन, अकल मुंडा, चरका करमाली, कौलेश्वर मांझी, सीतामुनी देवी, सूरज बेसरा, सुबितराम मांझी, कजरू उरांव, बरजू उरांव समेत कई लोग उपस्थित थे.
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