खास बातें1. भ्रष्टाचार के दाग और जांच एजेंसियों का शिकंजा2. संदेशखाली और महिला सुरक्षा का मुद्दा3. एंटी-इन्कम्बेंसी और प्रशासन पर सवाल4. भाजपा का बढ़ता वोट शेयर और हिंदुत्व कार्ड5. युवाओं का मोहभंग और बेरोजगारीबाजी पलटेंगी ‘फाइटर’? Mamata Banerjee Challenges 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों की घड़ी जैसे-जैसे करीब आ रही है, राजनीतिक गलियारों में यह सवाल गूंज रहा है कि क्या मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपनी सत्ता बचा पायेंगी. जानकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 15 वर्षों के शासन के बाद इस बार दीदी के लिए डगर सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण है. भ्रष्टाचार के आरोपों से लेकर मजबूत होती विपक्षी भाजपा तक, कई ऐसे मोर्चे हैं, जहां तृणमूल कांग्रेस (TMC) घिरती नजर आ रही है. 1. भ्रष्टाचार के दाग और जांच एजेंसियों का शिकंजा ममता बनर्जी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं. शिक्षक भर्ती घोटाला, राशन घोटाला और कोयला तस्करी जैसे मामलों में पार्टी के कई दिग्गज नेता जेल में हैं. ईडी और सीबीआई की सक्रियता ने सरकार की छवि पर गहरा असर डाला है. जनता के बीच यह संदेश गया है कि भ्रष्टाचार निचले स्तर तक जड़ें जमा चुका है. 2. संदेशखाली और महिला सुरक्षा का मुद्दा बंगाल में महिलाएं ममता बनर्जी का सबसे बड़ा वोट बैंक रही हैं. संदेशखाली और आरजी कर मेडिकल कॉलेज जैसी घटनाओं ने इस भरोसे को हिलाकर रख दिया है. महिलाओं के खिलाफ अत्याचार के आरोपों ने विपक्षी दलों को सरकार को घेरने का बड़ा हथियार दे दिया है. भाजपा लगातार महिला सुरक्षा को मुद्दा बनाकर टीएमसी के इस मजबूत किले में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है. बंगाल की खबरें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें 3. एंटी-इन्कम्बेंसी और प्रशासन पर सवाल लगातार तीन कार्यकाल और 15 साल सत्ता में रहने के बाद किसी भी सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर (Anti-Incumbency) होना स्वाभाविक है. जमीनी स्तर पर तृणमूल कार्यकर्ताओं की दादागिरी और सिंडिकेट राज की शिकायतों ने आम लोगों में नाराजगी पैदा की है. सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने के बावजूद, प्रशासनिक भ्रष्टाचार एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया है. इसे भी पढ़ें : बंगाल की राजनीति के ‘गेमचेंजर’ हैं शुभेंदु अधिकारी? नंदीग्राम के नायक से ममता बनर्जी को ललकारने तक, जानें 5 अनकहे सच 4. भाजपा का बढ़ता वोट शेयर और हिंदुत्व कार्ड वर्ष 2011 में महज 4 प्रतिशत वोट शेयर वाली भाजपा आज बंगाल में मुख्य प्रतिद्वंद्वी है. वर्ष 2021 में 77 सीटें जीतने के बाद भाजपा का संगठन अब बूथ स्तर तक मजबूत हो चुका है. धार्मिक ध्रुवीकरण और हिंदुत्व के मुद्दे ने बंगाल की पारंपरिक राजनीति को बदल दिया है. उत्तर बंगाल और जंगलमहल जैसे इलाकों में भाजपा की पकड़ टीएमसी के लिए बड़ी मुसीबत बन सकती है. इसे भी पढ़ें : बंगाल चुनाव की काउंटिंग से पहले अभिषेक बनर्जी ने संभाला मोर्चा, 291 सीटों के काउंटिंग एजेंट्स की लेंगे क्लास 5. युवाओं का मोहभंग और बेरोजगारी भर्ती घोटालों के कारण राज्य के शिक्षित युवाओं में भारी निराशा है. रोजगार के अवसरों की कमी और औद्योगिक विकास की धीमी रफ्तार ने युवा मतदाताओं को विकल्प तलाशने पर मजबूर किया है. टीएमसी की कल्याणकारी योजनाएं (जैसे लक्ष्मी भंडार) गरीबों को तो लुभा रही हैं, लेकिन महत्वाकांक्षी युवा वर्ग बदलाव की ओर देख रहा है. इसे भी पढ़ें : भवानीपुर बना ‘मनोवैज्ञानिक युद्धक्षेत्र’, ममता के गढ़ में शुभेंदु की एंट्री से दिलचस्प हुआ मुकाबला, क्या ‘मिनी इंडिया’ तोड़ेगा दीदी की अजेय छवि? Mamata Banerjee Challenges 2026: बाजी पलटेंगी ‘फाइटर’? ममता बनर्जी को ‘फाइटर’ माना जाता है और वे ऐन वक्त पर बाजी पलटने में माहिर हैं. लेकिन 4 मई को आने वाले नतीजे यह तय करेंगे कि क्या दीदी की ‘अस्मिता की राजनीति’ इन चुनौतियों को पार कर पाती है या बंगाल की सत्ता में कोई नया चेहरा नजर आयेगा. इसे भी पढ़ें कौन हैं सुनील बंसल? जिनकी ‘साइलेंट’ रणनीति ने उड़ा दी ममता बनर्जी की नींद, सामने आया बीजेपी का सबसे बड़ा ‘गेमचेंजर’ श्मशान में आये एक फोन ने बदल दी किस्मत, हाथ पर ‘चे ग्वेरा’ और दिल में ‘राम’, जानें बीजेपी विधायक शंकर घोष की अनसुनी कहानी मौसम की तरह बदली सियासत, विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा जाने वाली इकलौती नेता, कांग्रेस में वापसी का क्या है खेल? बीजेपी के ‘राहुल गांधी’ : लाल से हरा और अब भगवा, रुद्रनील घोष के ‘शिवपुर’ लौटने की इनसाइड स्टोरी