सोहराय पर्व सभ्यता व संस्कृति का प्रतीक
Author :Prabhat Khabar Digital Desk
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Updated at :06 Nov 2018 1:53 AM
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बडकागांव : सोहराय पर्व हमारी सभ्यता व संस्कृति का प्रतीक है. यह पर्व पालतू पशु व मानव के बीच प्रेम स्थापित करता है. यह पर्व भारत के मूल निवासियों के लिए विशिष्ट पर्व है. क्योंकि भारत के अधिकांश मूल निवासी खेती-बारी पर निर्भर है. आज भी खेती बैल व भैंस से की जाती है. इस […]
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बडकागांव : सोहराय पर्व हमारी सभ्यता व संस्कृति का प्रतीक है. यह पर्व पालतू पशु व मानव के बीच प्रेम स्थापित करता है. यह पर्व भारत के मूल निवासियों के लिए विशिष्ट पर्व है. क्योंकि भारत के अधिकांश मूल निवासी खेती-बारी पर निर्भर है. आज भी खेती बैल व भैंस से की जाती है. इस पर्व में पशुओं को माता लक्ष्मी की तरह पूजा की जाती है.
इस दिन बैलों व भैंसों को पूजा कर किसान वर्ग धन संपत्ति वृद्धि की मांग करते है. सोहराय का पर्व झारखंड के सभी जिले में मनाये जाते है. इसे शैल चित्र या शैल दीर्घा भी कहा जाता है.
कब मनाते है सोहराय पर्व
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के प्रतिपदा तिथि अर्थात दीवाली के दूसरे दिन मनाया जाता है. इस दिन किसान वर्ग गोशाला को गोबर व मिट्टी से लिपाई-पुताई कर सजाते है. पशुओं को भी स्नान करा कर तेल मालिश करते है. उनके माथे व सिंग में सिंदूर टीका लगाया जाता है. लाल रंग से पशुओं के शरीर पर गोलाकार बनाते है.
उसके बाद उनकी पूजा की जाती है. सात प्रकार के अनाज से बने दाना व पकवान को पशुओं को खिलाया जाता है. पशुओं का देखभाल करनेवाले चरवाहा या गोरखिया को भी नये- नये कपड़े देकर उसे सम्मानित किया जाता है. इसके बाद सोहराय मेला लगाया जाता है. इसमें बैलों व सूअरों को लड़ाया जाता है. इसमें बैलों की जीत हो जाती है. इस संबंध में ग्रामीणों का कहना है कि यह डाढ़ मेला इसलिए लगाया जाता है कि इससे बैल व भैंसा खूंखार जंगली जानवरों से सामना करने में सक्षम होते है
कैसे शुरू हुआ यह उत्सव
सोहराय कला एक कला है. इसका प्रचलन हजारीबाग जिले के बड़कागांव आसपास के क्षेत्र में आज से कई वर्ष पूर्व शुरू हुआ था. इस क्षेत्र के इस्को पहाड़ियों की गुफाओं में आज भी इस कला के नमूने देखे जा सकते है. यह कला गुफाओं की दीवारों से निकल कर घरों की दीवारों में अपना स्थान बना पाने में सफल हुई.
अब अत्याधुनिक व फैशन के जमाने में सोहराय कला धीरे धीरे लुप्त होती जा रही है. लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में सोहराय कला या कोहबर कला का आज भी प्रचलन है. हजारीबाग जिले के बड़कागांव की सोमरी देवी, पचली देवी, सारो देवी, पातो देवी, रूकमणी देवी आज भी शादी-विवाह या कोई पर्व त्योहार के अवसर पर सोहराय कला आज भी बनाती है.
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