नक्सलियों की आवाजाही कम हुई, तो विकास की आस लगाये बैठे हैं ग्रामीण

Updated at : 02 Apr 2019 1:38 AM (IST)
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नक्सलियों की आवाजाही कम हुई, तो विकास की आस लगाये बैठे हैं ग्रामीण

तीन साल पहले तक गांव में नक्सली ठहरते थे. गांव में खाना खाते थे. अब फिजां बदल रही है गुमला : गुमला प्रखंड की कतरी पंचायत में हेठजोरी गांव है. चारों ओर जंगल व पहाड़ से घिरे हेठजोरी गांव में तीन साल पहले तक नक्सलियों का डेरा रहता था. नक्सली दस्ते के साथ आकर इस […]

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तीन साल पहले तक गांव में नक्सली ठहरते थे. गांव में खाना खाते थे. अब फिजां बदल रही है

गुमला : गुमला प्रखंड की कतरी पंचायत में हेठजोरी गांव है. चारों ओर जंगल व पहाड़ से घिरे हेठजोरी गांव में तीन साल पहले तक नक्सलियों का डेरा रहता था. नक्सली दस्ते के साथ आकर इस गांव में रूकते थे.
गांव में ही खाना-पीना होता था, लेकिन समय के साथ इस क्षेत्र में नक्सलियों की आवाजाही कम हुई है. ग्रामीण कहते हैं कि अब इस गांव में नक्सली नहीं आते हैं. नक्सलियों की आवाजाही कम हुई, तो अब गांव के लोग विकास के लिए छटपटा रहे हैं. ग्रामीण कहते हैं कि हमारे गांव की तकदीर व तसवीर कब बदलेगी. आजादी के 70 साल बाद भी विकास के लिए ग्रामीण तरस रहे हैं. हेठजोरी गांव जाने के लिए माड़ापानी व पतगच्छा से होकर रास्ता है, लेकिन दोनों तरफ रास्ता खतरनाक है. माड़ापानी से होकर उबड़-खाबड़ सड़क है और पतगच्छा से पहाड़ चढ़ना पड़ता है. गांव में करीब 115 परिवार है, जहां 650 लोग रहते हैं.
इस गांव की सुविधा पर नजर डालें, तो आजादी के 70 साल में गांव में सिर्फ बिजली, स्कूल और पानी के लिए एक टोला में सोलर सिस्टम से पानी टंकी का निर्माण हुआ है. वर्तमान में मनरेगा से एक कुआं भी खोदा जा रहा है. इन चार सुविधाओं को अगर-अलग कर दिया जाये, तो यहां समस्याओं की लंबी सूची है. ग्रामीणों के अनुसार, सोलर जलमीनार एक टोला में बनी है. दूसरे टोला में जल संकट गहराया हुआ है.
प्राथमिक स्वास्थ्य उपकेंद्र का निर्माण होना था. ठेकेदार ने अधूरा भवन बना कर छोड़ दिया. यहां इलाज की सुविधा नहीं है. सड़क नहीं रहने से आवागमन में परेशानी होती है. रसोई गैस सिलेंडर का कोई उपयोग नहीं. आज भी लोग लकड़ी लाकर भोजन बनाते हैं. शौचालय नहीं बना है. कुछ घरों में शौचालय है, तो पानी नहीं है. राशन कार्ड कई परिवार के पास नहीं है. कई लोगों को वृद्धावस्था पेंशन नहीं मिलती है.
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