164 गांवों में आदिम जनजातियों का डेरा, जी रहे हैं भगवान भरोसे
Updated at : 27 Dec 2018 8:53 AM (IST)
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दुर्जय पासवान, गुमला : गुमला जिले में 20 हजार से अधिक आदिम जनजाति के लोग निवास करते हैं, लेकिन इनकी जिंदगी भगवान भरोसे है. इस जनजाति के लिए सरकारी सुविधा महज दिखावा है. सरकारी सिस्टम में लापरवाही के कारण सरकारी योजनाएं आदिम जनजाति बहुल गांवों तक नहीं पहुंच पा रही है. यही वजह है कि […]
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दुर्जय पासवान, गुमला : गुमला जिले में 20 हजार से अधिक आदिम जनजाति के लोग निवास करते हैं, लेकिन इनकी जिंदगी भगवान भरोसे है. इस जनजाति के लिए सरकारी सुविधा महज दिखावा है. सरकारी सिस्टम में लापरवाही के कारण सरकारी योजनाएं आदिम जनजाति बहुल गांवों तक नहीं पहुंच पा रही है. यही वजह है कि आज भी इस जाति के लोगों का जीवन जंगलों पर आश्रित है.
गांवों में पीने के लिए स्वच्छ पानी नहीं मिलता है. शौच के लिए शौचालय नहीं है. चलने के लिए सड़क नहीं है. कई गांवों में अभी तक बिजली नहीं पहुंची है. अगर कहीं पोल व तार है, तो विद्युत आपूर्ति नहीं होती है. रोजगार का साधन नहीं है. बॉक्साइट क्षेत्रों में रहने वाले आदिम जनजाति के लोग अपनी ही जमीन पर आज मजदूरी करने को विवश हैं.
गांवों में काम नहीं रहने के कारण युवक-युवती पलायन कर गये हैं. शिक्षा का स्तर सबसे खराब है. सातवीं व आठवीं कक्षा की पढ़ाई के बाद कई युवक-युवती बीच में पढ़ाई छोड़ घर की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने में लग जाते हैं.
आदिम जनजाति घरों में शौचालय नहीं
आदिम जनजाति बहुल गांवों में स्वच्छ भारत अभियान फेल है. सरकार की योजना हर घर में शौचालय बने. यह महज जुमला साबित हो रहा है.
आजादी के 70 वर्ष हो गये. अभी तक आदिम जनजाति गांवों में शौचालय नहीं है. आज भी पाट क्षेत्र में निवास करने वाले आदिम जनजाति के लोग खुले में शौच जाते हैं. दिलचस्प बात यह है कि पूर्व में भी निर्मल भारत अभियान चला था, जिसमें हरेक घर में शौचालय बनाने की योजना थी. बिशुनपुर में शौचालय बनाने का काम हुआ था. निर्मल भारत के तहत बिशुनपुर को राष्ट्रपति पुरस्कार मिल चुका है. लेकिन दुर्भाग्य है कि अभी तक पाट क्षेत्र में रहने वाले लोगों के घरों में शौचालय नहीं बना है.
आवास निर्माण में भी गड़बड़ी हुई है
आदिम जनजातियों के रहने के लिए पक्का आवास बनना था. इसके लिए सरकार ने आवास योजना शुरू की थी. लाभुकों का चयन किया गया था. पंचायत सेवकों को घर बनवाने की जिम्मेवारी थी, लेकिन कई पंचायत सेवक आदिम जनजातियों के आवास का पैसा खा गये. अभी भी लाभुकों का घर आधा अधूरा है. कई बार आदिम जनजातियों ने आइटीडीए विभाग के अधिकारियों से मिल कर आवास बनवाने की मांग की, लेकिन अभी तक आवास पूरा नहीं हुआ है.
चार आदिम जनजाति लोग मर चुके हैं
जंगल व पहाड़ों में रहने वाले आदिम जनजाति बहुल गांवों में स्वास्थ्य सुविधा नहीं है. यही वजह है कि अक्सर स्वास्थ्य सुविधा के अभाव में आदिम जनजाति लोग मरते रहे हैं. खास कर मलेरिया व डायरिया से मौत हो रही है. कुछ माह पहले बिशुनपुर प्रखंड के तुसरूकोना गांव में दो बच्चों की मलेरिया से मौत हुई थी. दोनों एक ही परिवार के थे, जबकि इसी गांव में कई लोग पीड़ित थे. जिन्हें बिशुनपुर अस्पताल लाकर इलाज कराया गया था. वहीं घाघरा प्रखंड में दो आदिम जनजाति के लोगों की भी मौत हो चुकी है. आदिम जनजाति बहुल गांव दूर होने व आने-जाने के लिए सड़क नहीं होने के कारण बीमार लोगों को अस्पताल ले जाने में परेशानी होती है.
आदिम जनजाति बहुल पंचायत के नाम
बिशुनपुर प्रखंड के बिशुनपुर, बनारी, गुरदरी, अमतीपानी, सेरका, निरासी, नरमा, हेलता, चीरोडीह, घाघरा, डुमरी व जारी प्रखंड के जरडा, डुमरी, सिकरी, जुरहू, करनी, गोविंदपुर, मेराल, मझगांव, अकासी, उदनी, जैरागी, खेतली, पालकोट प्रखंड के डहूपानी, कुल्लूकेरा, कामडारा प्रखंड के रेड़वा, गुमला के घटगांव, आंजन, रायडीह प्रखंड के ऊपरखटंगा, कांसीर, पीबो, जरजट्टा, सिलम, कोंडरा, केमटे, कोब्जा, नवागढ़, घाघरा प्रखंड के विमरला, घाघरा, रूकी, सेहल, आदर, दीरगांव, सरांगो, चैनपुर प्रखंड के बामदा, जनावल, छिछवानी, कातिंग, मालम व बरडीह पंचायत में सबसे अधिक आदिम जनजाति के लोग निवास करते हैं.
आदिम जनजाति, जो गुमला में रहती है
असुर, कोरवा, बृजिया, बिरहोर, परहैया आदिम जनजाति के लोग गुमला में रहते हैं. कुल 49 पंचायत के 164 गांवों में आदिम जनजातियों का डेरा है. कुल परिवारों की संख्या 3391 है. आबादी 20 हजार से अधिक है.
बकरी-बकरा वितरण में भी घोटाला
आदिम जनजाति के लोगों को पशुपालन से जोड़ने के लिए बकरी व बकरा देना था. आइटीडीए विभाग द्वारा बकरी व बकरा का वितरण किया जाना था, लेकिन जिस स्वयं सेवा संस्था को इसकी जिम्मेवारी दी गयी थी, कागजों में बकरी व बकरा बांट कर आदिम जनजातियों का हक मार लिया गया है. ऐसे कुछ लोगों को बकरी व बकरा मिला है, लेकिन ज्यादा दिन तक वे जिंदा नहीं रह सके.
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