मिट्टी कला के कुम्हारों को झारखंड सरकार की माटी कला बोर्ड योजना ने दिया नया जीवन

Published by : SANJEET KUMAR Updated At : 12 Oct 2025 10:59 PM

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माटी कला बोर्ड योजना से सब्सिडी पर मिले चाक मशीन व उद्योग विभाग से मिली पूंजी से बढ़ी कार्य क्षमता

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दिवाली के त्योहार पर मिट्टी के दीपक, धूपदान, कलश आदि की खरीदारी बढ़ जाती है, लेकिन त्योहार के बाद इसकी मांग घटने से कुम्हारों के सामने रोजी-रोटी की समस्या आ खड़ी होती है. परंपरागत हाथ वाले चाक की धीमी गति के कारण यह व्यवसाय धीमा पड़ गया था और कई कुम्हार इससे दूर होने लगे थे. झारखंड सरकार की माटी कला बोर्ड योजना एवं उद्योग विभाग ने इस समस्या का समाधान निकालते हुए कुम्हारों को 90% सब्सिडी पर आधुनिक चाक मशीन उपलब्ध करायी है. इसके साथ ही बैंकों के माध्यम से पूंजी भी दी जा रही है, जिससे कुम्हारों की कार्यक्षमता दोगुनी हो गयी है. गोड्डा के शिवपुर इलाके में अब कुम्हार दिन में 1200 से 1500 मिट्टी के दीपक बना पा रहे हैं, जबकि पहले यह संख्या 600 से 700 तक सीमित थी.

आधुनिक जीवनशैली से बिक्री में आयी गिरावट, योजना से मिली राहत

पहले मिट्टी के बने सामानों की दिवाली में अधिक मांग होती थी, लेकिन अब रंग-बिरंगी लाइटों के कारण मांग कम हो गयी थी और कुम्हार आर्थिक तंगी झेल रहे थे. कई कुम्हार इस व्यवसाय को छोड़ भी चुके थे. माटी कला बोर्ड योजना और उद्योग विभाग की मदद से कुम्हार रासबिहारी पंडित, संतलाल पंडित, श्याम पंडित समेत अन्य ने बताया कि इस योजना ने उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाया है और सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति में भी सुधार हुआ है. अब वे बेहतर आय से अपने परिवार को शिक्षित और स्वस्थ रखने में समर्थ हैं. इस पहल से कुम्हारों को पुनः स्वरोजगार की मुख्यधारा में लौटने का अवसर मिला है और उनका जीवन स्तर सुधर रहा है.

क्या कहते हैं कुम्हार

इलेक्ट्रॉनिक चाक मिलने से समय और मेहनत की बचत होती है. हम व्यापारियों से ऑर्डर लेकर एडवांस राशि में ही काम कर लेते हैं. आर्थिक परेशानी कम होती है. यह सुविधा माटी कला बोर्ड द्वारा उपलब्ध की गयी है.

– महेंद्र पंडित, कुम्हार

हमारा काम दीपावली से शुरू होकर छठ तक चलता है. इसके बाद मिट्टी का काम बंद हो जाता है और परिवार के सदस्य अन्य कामों में लग जाते हैं. अब लोग मिट्टी के सामान केवल सगुन के रूप में ही खरीदते हैं.

– मनोज पंडित, कुम्हार

कुम्हार समाज मिट्टी से मूर्तियां और बर्तन बनाता है, परंतु मिट्टी जुटाना चुनौतीपूर्ण होता है. अपनी जमीन नहीं होने से हमें दूसरों की जमीन से ₹1000 प्रति ट्रेलर मिट्टी खरीदनी पड़ती है. साथ ही पुआल-उपला भी महंगा हो गया है.

– पंचानंद पंडित, कुम्हार

सरकार की माटी कला योजना सराहनीय है. पहले हाथ से चाक घुमा कर काम करना मुश्किल था, अब इलेक्ट्रिक चाक से उत्पादन दोगुना हो गया है. अब कुल्हड़ और मिट्टी के बर्तनों की मांग बढ़ी है, लोग इन्हें प्राथमिकता दे रहे हैं.

– जयनारायण पंडित, कुम्हार

मैंने अपने पिता से मिट्टी के दीये बनाना सीखा था. पहले दीपावली में 70-75 हजार दीये बनते थे, अब यह संख्या घटकर 10-15 हजार रह गयी है. यदि चाइनीज लाइटों का क्रेज यूं ही बढ़ता रहा, तो यह व्यवसाय सिमट जाएगा.

– रासबिहारी पंडित, कुम्हारB

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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