गढ़वा में पलायन का दंश! हैदराबाद में एक और मजदूर की मौत, एक हफ्ते में दो घरों के बुझा चिराग

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गढ़वा की धुरकी रोती बिलखती और शोकाकुल उपेंद्र कोरवा की पत्नी (दांए). फोटो: प्रभात खबर

Garhwa News: गढ़वा के धुरकी क्षेत्र से हैदराबाद गए मजदूर उपेंद्र कोरवा की काम के दौरान मौत ने पलायन की त्रासदी उजागर कर दी. एक सप्ताह में दो मजदूरों की मौत से गांव में मातम है. ग्रामीणों ने स्थानीय रोजगार और मजदूर सुरक्षा को लेकर सरकार से ठोस कदम उठाने की मांग की है. इससे संबंधित पूरी खबर नीचे पढ़ें.

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गढ़वा से अनूप जायसवाल की रिपोर्ट

Garhwa News: झारखंड के गढ़वा जिले से एक बार फिर पलायन की दर्दनाक कहानी सामने आई है. धुरकी थाना क्षेत्र के खुटिया पंचायत अंतर्गत परासपानी (पश्चिम टोला) गांव के आदिम जनजाति मजदूर उपेन्द्र कोरवा (38) की हैदराबाद में काम के दौरान मौत हो गई. गुरुवार शाम जैसे ही उनका शव गांव पहुंचा, पूरे इलाके में मातम छा गया और परिजनों की चीख-पुकार से माहौल गमगीन हो उठा.

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गांव में बढ़ी चिंता

सबसे चिंताजनक बात यह है कि महज एक सप्ताह के भीतर इसी गांव के दो आदिम जनजाति मजदूरों की बाहर काम करने के दौरान मौत हो चुकी है. वहीं, पिछले दो महीनों में धुरकी क्षेत्र के पांच मजदूर अपनी जान गंवा चुके हैं. लगातार हो रही इन घटनाओं ने ग्रामीणों के बीच भय और चिंता का माहौल पैदा कर दिया है.

काम के दौरान हादसा, इलाज के दौरान तोड़ा दम

परिजनों के अनुसार, उपेन्द्र कोरवा करीब एक साल पहले गांव के ही एक ठेकेदार के माध्यम से हैदराबाद काम करने गए थे. सोमवार को काम के दौरान वह छत से गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गए. उन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन मंगलवार को उन्होंने दम तोड़ दिया. इस हादसे ने एक परिवार की पूरी दुनिया उजाड़ दी.

शव पहुंचते ही गांव में मचा कोहराम

जैसे ही उपेन्द्र का शव गांव पहुंचा, पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई. परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है. गांव के लोग भी इस घटना से स्तब्ध हैं. हर किसी की जुबान पर यही सवाल है कि आखिर कब तक मजदूरों को रोजी-रोटी के लिए अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ेगी.

मुआवजे का ऐलान

ठेकेदार और कंपनी की ओर से मृतक के परिजनों को कुल 4 लाख रुपये की सहायता राशि देने की बात कही गई है. इसमें से 2 लाख रुपये तत्काल नकद दिए गए हैं, जबकि शेष राशि हैदराबाद में दी जाएगी. हालांकि, यह आर्थिक सहायता उस परिवार के दर्द को कम नहीं कर सकती, जिसने अपना कमाने वाला सदस्य खो दिया है.

जनप्रतिनिधियों ने बंधाया ढांढस

घटना की सूचना मिलते ही जिला परिषद सदस्य सुनीता कुमारी, विधायक प्रतिनिधि लक्ष्मण प्रसाद यादव, उप प्रमुख धर्मेंद्र यादव और मुखिया प्रतिनिधि इस्लाम खान सहित कई जनप्रतिनिधि मौके पर पहुंचे. उन्होंने परिजनों को सांत्वना दी और हर संभव सहायता का आश्वासन दिया.

अब कौन संभालेगा परिवार?

मृतक के परिजन विशुनधारी कोरवा ने कहा कि उपेन्द्र ही परिवार का एकमात्र सहारा था. अब उनके छोटे बच्चों और बुजुर्ग माता-पिता का पालन-पोषण कैसे होगा, यह सबसे बड़ी चिंता है. उन्होंने कहा कि जब ताबूत में बंद होकर शव गांव आता है, तो दिल दहल जाता है. अगर गांव में रोजगार मिलता, तो मजदूरों को बाहर जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती.

स्थानीय रोजगार की मांग तेज

लगातार हो रही मजदूरों की मौत के बाद ग्रामीणों ने सरकार से स्थानीय स्तर पर रोजगार की ठोस व्यवस्था करने की मांग की है. उनका कहना है कि मजबूरी में मजदूरों को दूसरे राज्यों में जाना पड़ता है, जहां सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होती. यदि गांव में ही काम के अवसर मिलें, तो इस तरह की घटनाओं से बचा जा सकता है.

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पलायन बना मौत का सफर

गढ़वा और आसपास के इलाकों में पलायन अब एक गंभीर सामाजिक समस्या बन चुका है. बेहतर रोजगार की तलाश में मजदूर दूर-दराज के शहरों में जाते हैं, लेकिन कई बार यह सफर उनकी जिंदगी के लिए खतरा बन जाता है. उपेन्द्र कोरवा की मौत ने एक बार फिर इस कड़वी सच्चाई को उजागर कर दिया है.

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