पौष्टिक आहार तो दूर, भरपेट भोजन भी नसीब नहीं

– मो परवेज – यह कैसी आजादी, बीहड़ के नौनिहालों की जिंदगी दांव पर गालूडीह : 15 अगस्त को आजादी का दिन है. सच्ची आजादी या फिर बापू का सपना तभी साकार होगा, जब आम आदमी को अधिकार मिले. गांव खुशहाल हो. सभी को भरपेट भोजन नसीब हो. कोई भूख से ना मरे और कुपोषित […]
– मो परवेज –
यह कैसी आजादी, बीहड़ के नौनिहालों की जिंदगी दांव पर
गालूडीह : 15 अगस्त को आजादी का दिन है. सच्ची आजादी या फिर बापू का सपना तभी साकार होगा, जब आम आदमी को अधिकार मिले. गांव खुशहाल हो. सभी को भरपेट भोजन नसीब हो.
कोई भूख से ना मरे और कुपोषित होकर बीमार न पड़े. हर किसी के चहरे में मुस्कुराहट हो, परंतु ऐसा कम से कम गांवों में कहीं नजर नहीं आता. खास कर बीहड़ और पहाड़ों पर बसे गांवों में. वहां के लोग आजादी क्या है, यह नहीं जानते. उनके हिस्से सिर्फ तकलीफ और दुख ही है.
देश के 70 प्रतिशत आबादी गांवों में बसती है, परंतु इस आबादी को सरकारी हुक्मरान और राजनेता नजर अंदाज कर महज 30 प्रतिशत शहरी आबादी की खातिर परेशान रहा करते हैं. घाटशिला प्रखंड का एक गांव है मिर्गीटांड़, जहां के अधिकांश बच्चे कुपोषण के शिकार हैं.
उक्त गांव के बच्चों को सरकारी स्कूल में एक समय का भोजन मिलता है, उसी से उसका पेट भरता है. घर में भर पेट भोजन तक नसीब नहीं होता. यहां के ग्रामीण जंगलों के भरोसे जीते हैं. आर्थिक स्थित ऐसी नहीं की दो समय का भोजन नसीब हो सके. इस गांव के ग्राम प्रधान रवि टुडू कहते हैं कुपोषण के कारण नौनिहालों की जिंदगी दांव पर लग गयी है.
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