जहां पुलिस फेल हो जाती थी, वहां सूर्यदेव बाबू संभालते थे स्थिति
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 15 Jun 2024 1:32 AM
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जब डीसी ने लिखा पत्र : सूर्यदेव बाबू नहीं होते, तो स्थिति नियंत्रित होना मुश्किल था
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समर श्रीवास्तव,
झरिया के दिवंगत विधायक सूर्यदेव सिंह मजदूरों के मसीहा थे. उनकी दबंग वाली छवि उनके विरोधियों ने बना दी थी, जबकि हकीकत में वह एक ऐसे व्यक्ति थे जिनके ऊपर आज तक किसी भी आम आदमी ने कभी भी कोई आरोप नहीं लगाया. वह एक ऐसी शख्सियत थे, जो विपरीत परिस्थिति में भी मोर्चा लेने से पीछे नहीं हटते थे. जहां पुलिस फेल हो जाती थी, वहां सूर्यदेव बाबू स्थिति संभाल लेते थे.झरिया व सिंदरी की घटना को नहीं भुलाया जा सकता :
झरिया के ऊपर कुल्ही में एक बार कुछ लोग माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहे थे. सूर्यदेव सिंह उस समय झरिया स्थित जमसं कार्यालय में बैठे थे. किसी ने सूचना दी, तो अकेले गाड़ी ले कर वहां पहुंच गये. माहौल बिगाड़ रहे लोगों को ललकारा. उनकी आवाज सुनते ही सभी लोग भाग गये. इस दौरान वहां एक महिला अपनी छोटी बच्ची को बचाने की गुहार लगा रही थी. सूर्यदेव बाबू ने खुद बच्ची को गोद में उठा कर उस महिला को सौंपते हुए कहा था कि बहन चिंता नहीं करें, कोई आपको या आपकी बच्ची को नुकसान नहीं पहुंचा सकता है. इसी तरह एक बार सिंदरी में बाहरी-भीतरी के नाम पर हंगामा गया. पुलिस स्थिति नियंत्रित नहीं कर पा रही थी. यह जान विधायक श्री सिंह वहां पहुंचे और मोर्चा संभाला. धनबाद के तत्कालीन डीसी ने राज्य सरकार को भेजी गयी अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि आज विधायक सूर्यदेव सिंह नहीं पहुंचते, तो वहां स्थिति नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता.न्यायपालिका का करते थे सम्मान :
सूर्यदेव सिंह पर कई मुकदमे दर्ज हुए, लेकिन उन्होंने हमेशा न्यायपालिका का सम्मान किया. एक सामान्य व्यक्ति से भी ज्यादा कोर्ट को सम्मान देते थे. वह एक दिलेर व्यक्ति थे.बिहार के बाढ़ पीड़ितों को दिये थे ब्लैंक चेक :
एक दिन मैं उनके साथ सिंह मैंसन में बैठा हुआ था. उस वक्त बिहार में बाढ़ से तबाही थी. धनबाद के तत्कालीन वरिष्ठ पत्रकार साथी बाढ़ पीड़ितों के लिए सहायता राशि जुटा रहे थे. सकुचाते हुए सभी लोग सिंह मैंसन पहुंचे, मदद की बात कही. इस पर उन्होंने ब्लैंक चेक बढ़ा दिया. बोले सतीश बाबू, जो मर्जी हो भर लीजिये, कैश हो जायेगा. उन्होंने 25 हजार रुपये लिखा. इस पर हंसते हुए कहा मैं तो ज्यादा देना चाहता था. सहायता के लिए उनका हाथ हमेशा खुला रहता था.लेखक धनबाद के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं, बार एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रह चुके हैं.
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