Dhanbad: सिंदरी में 2000 करोड़ की लागत से लगेगा नैनो उर्वरक संयंत्र, तैयार होगा नैनो यूरिया व डीएपी
नैनो प्लांट की सांकेतिक तस्वीर AI Image
Dhanbad: धनबाद के सिंदरी में 2000 करोड़ रुपये की लागत से अत्याधुनिक नैनो उर्वरक संयंत्र स्थापित किया जाएगा. इस परियोजना के तहत नैनो यूरिया और नैनो DAP का उत्पादन होगा, जिससे किसानों को बेहतर और किफायती उर्वरक मिल सकेगा. पूरी रिपोर्ट नीचे पढ़ें.
सिंदरी से अजय उपाध्याय की रिपोर्ट
Dhanbad (सिंदरी): खेती को रासायनिक उर्वरकों के दुष्प्रभाव से बचाने और आधुनिक तकनीक से जोड़ने की दिशा में सिंदरी जल्द ही एक बड़ा केंद्र बनने जा रहा है. हर्ल यहां नैनो यूरिया और नैनो डीएपी के उत्पादन के लिए अत्याधुनिक संयंत्र स्थापित करने की तैयारी में है, जिससे न केवल खेती की लागत और पर्यावरणीय दबाव कम होगा, बल्कि देश को महंगे आयातित उर्वरकों पर निर्भरता से भी राहत मिलेगी. फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन सह हर्ल के एमडी डॉ सिबा प्रसाद मोहंती ने मंगलवार को पत्रकारों को बताया कि नैनो यूरिया का उपयोग पौधों की पत्तियों पर स्प्रे द्वारा किया जाता है.
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार रासायनिक उर्वरक का विकल्प तलाशने की बात करते हैं. हर्ल ने रासायनिक उर्वरक के विकल्प के रूप में नैनो यूरिया और नैनो डीएपी का चयन किया है.
हर्ल के गोरखपुर संयंत्र में चल रहा निर्माण कार्य
हर्ल के गोरखपुर उर्वरक संयंत्र में नैनो यूरिया संयंत्र का निर्माण हो रहा है और जल्द ही सिंदरी में भी संयंत्र स्थापित होगा. उसके बाद नैनो डीएपी का भी निर्माण होगा. एमडी डॉ सिबा प्रसाद मोहंती ने बताया कि छह माह के भीतर नैनो यूरिया और डीएपी के निर्माण की टेक्निकल रिपोर्ट प्राप्त हो जायेगी. इसके बाद लगभग 2000 करोड़ की लागत से यहां नैनो यूरिया संयंत्र तैयार किया जायेगा.
प्रतिदिन 75-75 हजार बोतल उत्पादन का लक्ष्य
सिंदरी संयंत्र में प्रतिदिन नैनो यूरिया और डीएपी की 75-75 हजार बोतलें तैयार होंगी. हर्ल सिंदरी मैट्रिक्स फर्टिलाइजर के बाद दूसरा सबसे वृहद संयंत्र बन गया है. डॉ मोहंती ने बताया कि हर्ल के यूरिया उत्पादन की लागत 45-50 हजार रुपया प्रति मीट्रिक टन है और हम यूरिया का आयात कर रहे हैं. आयातित यूरिया की लागत 90 हजार रुपया प्रति मीट्रिक टन पड़ रही है. हर्ल के कारण भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा की बचत हो रही है.
नैनो उर्वरक खेती में क्यों है जरूरी
- पारंपरिक यूरिया का पूरा लाभ पौधों को नहीं मिल पाता
- मिट्टी व पर्यावरण पर पड़ता है नकारात्मक असर
क्या होते हैं फायदे
- कम मात्रा में ज्यादा असर
- खेती की लागत में कमी
- फसल उत्पादन व गुणवत्ता में सुधार
- विदेशी मुद्रा की बचत
पारंपरिक यूरिया से कैसे है अलग
- सामान्य यूरिया ठोस, नैनो यूरिया तरल रूप में
- नैनो कण होने से तेजी से अवशोषण
- कम मात्रा में अधिक प्रभाव
कैसे होता है इस्तेमाल
- पत्तियों पर स्प्रे के रूप में छिड़काव
- पानी में मिलाकर उपयोग
- फसल के विशेष चरणों में प्रयोग
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By AmleshNandan Sinha
अमलेश नंदन सिन्हा प्रभात खबर डिजिटल में वरिष्ठ पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता में 20 से अधिक वर्षों का अनुभव है. रांची विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद से इन्होंने कई समाचार पत्रों के साथ काम किया. इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत रांची एक्सप्रेस से की, जो अपने समय में झारखंड के विश्वसनीय अखबारों में से एक था. एक दशक से ज्यादा समय से ये डिजिटल के लिए काम कर रहे हैं. झारखंड की खबरों के अलावा, समसामयिक विषयों के बारे में भी लिखने में रुचि रखते हैं. विज्ञान और आधुनिक चिकित्सा के बारे में देखना, पढ़ना और नई जानकारियां प्राप्त करना इन्हें पसंद है.
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