देवघर जिले में हर दिन हो रही एक नवजात की मौत
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 21 May 2018 6:59 AM
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देवघर : संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने के लिए स्वास्थ्य विभाग के प्रयास आज भी पूरी तरह कारगर साबित नहीं हो रहे हैं. राज्य में भले ही नवजात मृत्यु दर में कमी आयी हो लेकिन, देवघर में हालात अभी भी नहीं सुधरे हैं. जिले भर में पिछले एक साल के नवजात मृत्यु दर के आंकड़े […]
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देवघर : संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने के लिए स्वास्थ्य विभाग के प्रयास आज भी पूरी तरह कारगर साबित नहीं हो रहे हैं. राज्य में भले ही नवजात मृत्यु दर में कमी आयी हो लेकिन, देवघर में हालात अभी भी नहीं सुधरे हैं. जिले भर में पिछले एक साल के नवजात मृत्यु दर के आंकड़े काफी चौंकाने वाले हैं.
मार्च 2017 से मार्च 2018 तक सरकारी व निजी क्लिनिक में 32,382 संस्थागत प्रसव किये गये. इनमें सरकारी अस्पतालों में 358 नवजात दुनिया देखने से पहले ही चल बसे. निजी क्लिनिकों के आंकड़े जिला स्वास्थ्य विभाग के पास नहीं हैं. अगर विभाग के पास ये आंकड़े उपलब्ध होते तो यह संख्या काफी बढ़ सकती है. नवजात की मौत की सबसे बड़ी वजह सरकारी अस्पताल में अव्यवस्था व इलाज में लापरवाही बन रही है. संस्थागत प्रसव के लिए बार-बार कार्यशाला का आयोजन होता है. डॉक्टर अपनी जिम्मेदारी ईमानदारीपूर्वक निभाने का संकल्प भी लेते हैं लेकिन ड्यूटी के वक्त अपनी जवाबदेही भूल जाते हैं
सीएचसी में न्यू बोर्न केयर यूनिट व सदर अस्पताल में एसएनसीयू फिर भी हो रही मौत : सदर अस्पताल, मधुपुर के अनुमंडल अस्पताल के अलावा जिले भर के दस प्रखंड में सात सीएचसी व पांच पीएचसी हैं. जिले भर के सरकारी अस्पतालों में केवल छह स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ हैं. सीएचसी में संस्थागत प्रसव होता है. सीएचसी में न्यू बोर्न केयर यूनिट रहने के बावजूद प्रसूता की हालत बिगड़ने पर उसे आनन-फानन में देवघर रेफर कर दिया जाता है ताकि सदर अस्पताल में उपलब्ध सुविधाएं जच्चा-बच्चा की जान बचाने में कारगर साबित हाेंगी. सदर अस्पताल में एसएनसीयू भी चल रहा है. लेकिन, आंकड़े यह बताने के लिए काफी हैं कि सदर अस्पताल में भी संस्थागत प्रसव की हालत खराब है. सदर अस्पताल में ही साल भर में 75 नवजात की मौत हो चुकी है.
केस स्टडी- 1
सदर अस्पताल देवघर में पांच मई की सुबह करीब पांच बजे देवघर बैजनाथपुर के नवाडीह गांव निवासी उमेश यादव अपनी पत्नी रीना देवी का संस्थागत प्रसव के लिए अस्पताल पहुंचे. सदर अस्पताल में महिला डॉक्टर नहीं होने कारण समय पर इलाज नहीं हो सका. पत्नी प्रसव के लिए महिला ओपीडी में लगभग पांच घंटे तक फर्श पर दर्द से तड़पती रही. फिर भी कोई देखने नहीं आया. परिजनों से रीना देवी को 10:30 बजे ऑटो में लेकर निजी क्लिनिक ले जाने के दौरान महिला का प्रसव ऑटो पर ही हो गया. रीना को फिर अस्पताल लाया गया. लेकिन यहां भी अस्पताल में संवेदनहीनता को भर्ती कर लिया और बच्चे को रेफर कर दिया गया. नवजात के इलाज के लिए निजी क्लिनिक व सदर अस्पताल की भागदौड़ में बच्चे की मौत हो गयी.
केस स्टडी – दो
शुक्रवार रात को सदर अस्पताल में दूसरी नवजात की मौत हो गयी. घटना के बाद परिजनों ने इलाज में स्वास्थ्य कर्मी पर लापरवाही की बात कहते हुए हंगामा भी किया. बिलासी टाउन निवासी चंदन द्वारी की पत्नी चंदा देवी को 17 मई की देर रात सदर अस्पताल के प्रसूति कक्ष में भर्ती कराया गया. इसके बाद साधारण प्रसव का इंतजार किया गया. शुक्रवार को रात को साधारण प्रसव से बच्ची हुई. कुछ ही देर में नवजात की मौत हो गयी. स्वास्थ्य कर्मियों ने इसे छिपा लिया. इसके बाद परिजन नवजात का इलाज कराने डॉक्टर सतीश ठाकुर के पास ले गये जहां बच्चे को मृत घोषित कर दिया व बताया कि बच्चे की मौत काफी पहले हो चुकी है. इसके बाद परिजन नवजात को लेकर वापस सदर अस्पताल लाकर इलाज में लापरवाही बताकर हंगामा किया.
आरडीडीएच ने कहा
जिले में नवजात बच्चों की मौत को रोकने के लिए अभियान चलाया जा रहा है. मौत का मुख्य का कारण है महिलाओं का देर से अस्पताल पहुंचना. प्री-मेच्याेर बच्चा होने तथा माताओं में खून की कमी के कारण नवजात की मौत हो रही है. इसे रोकने के प्रयास किये जा रहे हैं.
एक साल में 358 नवजात की मौत
देवघर सदर अस्पताल में ही 75 नवजात की गयी जान
जिले में नवजात बच्चों की मौत को रोकने के लिए अभियान चलाया जा रहा है. मौत का मुख्य का कारण है महिलाओं को देर से अस्पताल पहुंचना. प्री-मेच्याेर बच्चा होने तथा माताओं में खून की कमी के कारण नवजात की मौत हो रही है. इसे रोकने के प्रयास किये जा रहे हैं.
सदर अस्पताल देवघर में पांच मई की सुबह करीब पांच बजे देवघर बैजनाथपुर के नवाडीह गांव निवासी उमेश यादव अपनी पत्नी रीना देवी का संस्थागत प्रसव के लिए अस्पताल पहुंचे. सदर अस्पताल में महिला डॉक्टर नहीं होने कारण समय पर इलाज नहीं हो सका. पत्नी प्रसव के लिए महिला ओपीडी में लगभग पांच घंटे तक फर्श पर दर्द से तड़पती रही. फिर भी कोई देखने नहीं आया. परिजनों से रीना देवी को 10:30 बजे ऑटो में लेकर निजी क्लिनिक ले जाने के दौरान महिला का प्रसव ऑटो पर ही हो गया. रीना को फिर अस्पताल लाया गया. लेकिन यहां भी अस्पताल में संवेदनहीनता को भर्ती कर लिया और बच्चे को रेफर कर दिया गया. नवजात के इलाज के लिए निजी क्लिनिक व सदर अस्पताल की भागदौड़ में बच्चे की मौत हो गयी.
शुक्रवार रात को सदर अस्पताल में दूसरी नवजात की मौत हो गयी. घटना के बाद परिजनों ने इलाज में स्वास्थ्य कर्मी पर लापरवाही की बात कहते हुए हंगामा भी किया. बिलासी टाउन निवासी चंदन द्वारी की पत्नी चंदा देवी को 17 मई की देर रात सदर अस्पताल के प्रसूति कक्ष में भर्ती कराया गया. इसके बाद साधारण प्रसव का इंतजार किया गया. शुक्रवार को रात को साधारण प्रसव से बच्ची हुई. कुछ ही देर में नवजात की मौत हो गयी. स्वास्थ्य कर्मियों ने इसे छिपा लिया. इसके बाद परिजन नवजात का इलाज कराने डॉक्टर सतीश ठाकुर के पास ले गये जहां बच्चे को मृत घोषित कर दिया व बताया कि बच्चे की मौत काफी पहले हो चुकी है. इसके बाद परिजन नवजात को लेकर वापस सदर अस्पताल लाकर इलाज में लापरवाही बताकर हंगामा किया.
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