बेरमो के ढोरी इंकलाइन में हुई थी देश की दूसरी सबसे बड़ी खान दुर्घटना, 268 मजदूरों की हुई थी मौत

Published by : KumarVishwat Sen Updated At : 27 May 2026 2:46 PM

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इसी स्थान पर अभी है सीसीएल का ढोरी खास इंकलाइन फोटो: प्रभात खबर

Bokaro News: बोकारो के बेरमो स्थित ढोरी कोलियरी में 27-28 मई 1965 को देश की दूसरी सबसे बड़ी खान दुर्घटना हुई थी. भीषण विस्फोट में 268 मजदूरों की मौत हो गयी थी. जांच में मिथेन गैस और प्रबंधन की लापरवाही हादसे की बड़ी वजह मानी गयी. इससे जुड़ी खबर नीचे पढ़ें.

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बेरमो से राकेश वर्मा की रिपोर्ट

Bokaro News: झारखंड के बोकारो जिला स्थित बेरमो कोयलांचल की ढोरी कोलियरी में 27-28 मई 1965 की रात हुई भयावह दुर्घटना आज भी देश की सबसे दर्दनाक खान त्रासदियों में गिनी जाती है. तत्कालीन हजारीबाग जिले के अंतर्गत आने वाली इस खदान में हुए विस्फोट में 268 मजदूरों और कर्मचारियों की मौत हो गयी थी. यह हादसा देश की दूसरी सबसे बड़ी खान दुर्घटना माना जाता है. उस रात हुए विस्फोट ने पूरे इलाके को हिला कर रख दिया था और कई परिवार हमेशा के लिए उजड़ गये थे.

रात के सन्नाटे में हुआ भयानक विस्फोट

बताया जाता है कि 27 और 28 मई की दरम्यानी रात लगभग पौने एक बजे खदान के भीतर अचानक जोरदार विस्फोट हुआ. विस्फोट इतना भयानक था कि खदान के तीनों मुहानों से आग और लावा बाहर निकलने लगा. दूर-दूर तक चिंगारियां फैल गयीं और पूरे इलाके में तेज धमाके की आवाज गूंज उठी. आसपास रहने वाले लोग दहशत में घरों से बाहर निकल आये. विस्फोट के समय खदान के भीतर सैकड़ों मजदूर काम कर रहे थे. हादसा इतना अचानक हुआ कि कोई भी मजदूर बाहर निकलने का मौका नहीं पा सका. कई मजदूर अंदर ही जिंदा जल गये, जबकि कई की मौत दम घुटने से हो गयी.

रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटीं 30 टीमें

घटना के अगले दिन राहत और बचाव कार्य शुरू किया गया. रेस्क्यू ऑपरेशन में करीब 30 टीमों को लगाया गया था और हर टीम में पांच से छह सदस्य शामिल थे. खदान के बाहर और भीतर का दृश्य बेहद भयावह था. कई शव खदान के मुहाने के पास ही पड़े मिले, जबकि अंदर से निकाले गये शव बुरी तरह क्षत-विक्षत थे. कई शवों की पहचान तक कर पाना मुश्किल हो गया था. एक इंकलाइन के पास स्थित हाजिरी ऑफिस विस्फोट में पूरी तरह उड़ गया था. वहां मौजूद हाजिरी बाबू का शव करीब 25 फीट दूर मिला. दूसरी इंकलाइन में लगभग 200 वर्ग फीट क्षेत्र धंस गया था और उसका दरवाजा बंद हो गया था. अन्य इंकलाइनों की हालत भी कमोबेश ऐसी ही थी. मृतकों के शवों को ले जाने के लिए तत्कालीन एनसीडीसी, जिसे आज सीसीएल के नाम से जाना जाता है, ने ट्रकों की व्यवस्था की थी.

हड़ताल के बाद शुरू हुआ था काम

स्थानीय लोगों के अनुसार हादसे से पहले मजदूरों की 20 से 25 दिनों तक हड़ताल चली थी. हड़ताल खत्म होने के बाद मजदूरों को दोबारा खदान में काम पर भेज दिया गया, लेकिन खदान की सुरक्षा जांच सही तरीके से नहीं करायी गयी थी. विशेषज्ञों का मानना है कि यही लापरवाही बाद में इतने बड़े हादसे की वजह बनी. बताया जाता है कि दुर्घटना के समय कोलियरी का प्रधान प्रबंधक खदान में मौजूद नहीं था. वहीं खान मालिक राजा बहादुर के छोटे भाई बसंत नारायण सिंह उस दिन ढोरी में ही थे, लेकिन हादसे के बाद वह बाहर नहीं निकले. मजदूरों और उनके परिवारों का आरोप था कि कंपनी की ओर से घायलों और मृतकों के परिजनों के लिए तत्काल कोई ठोस व्यवस्था नहीं की गयी थी.

मुख्यमंत्री समेत कई बड़े नेता पहुंचे थे घटनास्थल

दुर्घटना के बाद तत्कालीन बिहार सरकार और केंद्र सरकार के कई मंत्री घटनास्थल पहुंचे थे. 29 मई की सुबह बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री कृष्ण बल्लभ सहाय ढोरी पहुंचे और मृतकों के परिजनों से मुलाकात की. उन्होंने हर संभव सहायता का भरोसा दिया और पटना लौटने के बाद एक लाख रुपये की सहायता राशि भेजी. उसी दिन केंद्रीय उप श्रम मंत्री आरके मालवीय भी केंद्रीय श्रम सचिव के साथ घटनास्थल पहुंचे. उन्होंने खदान के विभिन्न हिस्सों का निरीक्षण किया और बचाव कार्य की समीक्षा की. इसके बाद 30 मई को बिहार के तत्कालीन सिंचाई और बिजली मंत्री महेश प्रसाद सिंह तथा राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस के संगठन मंत्री एपी शर्मा ने भी घटनास्थल का दौरा किया. 31 मई को केंद्रीय श्रम मंत्री डी संजीवैया और बिहार के सहकारिता मंत्री हरिनाथ मिश्र भी ढोरी पहुंचे थे.

जांच में सामने आयी मिथेन गैस की बात

ढोरी खान दुर्घटना की जांच के लिए सरकार ने विशेष जांच अदालत का गठन किया था. जांच अदालत ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और स्थानीय लोगों के बयान दर्ज किये. बाद में धनबाद में इसकी विस्तृत सुनवाई हुई. जांच रिपोर्ट में बताया गया कि बीआई-10 खदान के 15वें दक्षिणी लेबुल में भारी मात्रा में मिथेन गैस जमा हो गयी थी. इसी दौरान एक व्यक्ति खुली बत्ती लेकर वहां चला गया, जिससे गैस में विस्फोट हो गया. खदान में जमा कोयले की धूल ने इस विस्फोट को और अधिक खतरनाक बना दिया. रिपोर्ट में साफ कहा गया कि दुर्घटना के लिए खदान प्रबंधन की लापरवाही जिम्मेदार थी.

आज भी लोगों के जेहन में ताजा है हादसा

ढोरी खान दुर्घटना को छह दशक से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन बेरमो कोयलांचल के लोगों के दिलों में उस दर्दनाक रात की याद आज भी जिंदा है. यह हादसा सिर्फ एक औद्योगिक दुर्घटना नहीं, बल्कि मजदूर सुरक्षा में हुई भारी लापरवाही का प्रतीक बन गया. आज भी जब 27-28 मई की तारीख आती है तो लोग उन 268 मजदूरों को नम आंखों से याद करते हैं, जिन्होंने खदान के भीतर अपनी जान गंवा दी थी.

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कब-कब कहां हुईं खान दुर्घटनाएं

  • 27 दिसंबर 1975: बोकारो से सटे चासनाला की भूमिगत खदान में पानी भर जाने से 376 कर्मी की मौत.
  • 1989: ईसीएल की महावीरा भूमिगत खदान में 65 कोयला मजदूर फंस गये थे. इसमें फंस गये सभी मजदूरों को बचा लिया गया.
  • 1998: बीसीसीएल की गजलीटांड़ भूमिगत खदान में पानी भर जाने से 65 कर्मियों की मौत.
  • 2007: बीसीसीएल की नगदा सेक्शन भूमिगत खदान में हुई दुर्घटना में 52 कर्मी काल कलवित हुए थे.
  • 2010: सीसीएल की बांसगढ़ा भूमिगत खदान में 14 कर्मियों की मौत.
  • 2012: ईसीएल के अंजन हिल में हुई घटना में 12 अधिकारियों, कोलकर्मियों व ठेका मजदूरों की मौत.
  • 2013-14: ढोरी एरिया के 4, 5, 6 इंकलाइन में पानी भर जाने से मैनेजर व माइनिंग सरदार की मौत.
  • 2014: सीसीएल के सयाल एरिया में हुई खान दुर्घटना में सात मजदूरों की मौत हुई थी.
  • 29 दिसंबर 2016: ईसीएल की राजमहल ललमटिया खुली खदान में 23 मजदूरों की जान गयी थी.

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लेखक के बारे में

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कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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