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बंद होते उद्योग-धंधों से कराह रही बेरमो

बंद होते उद्योग-धंधों से कराह रही बेरमो

राकेश वर्मा, बेरमो : झारखंड की औद्योगिक और कोयला नगरी बेरमो क्षेत्र में बंद होते उद्योग-धंधों को देख कर कराह रही है. हाल के कुछ वर्षों में सीसीएल की कई खदानें और कोल वाशरियां बंद हो गयी हैं. डीवीसी के बीटीपीएस व सीटीपीएस की कई इकाइयां भी बंद हुई हैं. इसके कारण क्षेत्र में रोजगार का बड़ा संकट पैदा हुआ है और पलायन बढ़ा है.

बेरमो में सीसीएल के तीन एरिया हैं, ढोरी, बीएंडके और कथारा. इन तीनों एरिया में सिर्फ ढोरी खास इंकलाइन को छोड़ कर सभी भूमिगत खदानें बंद हो गयीं. इसमें स्वांग थर्ड डिग्री भूमिगत खदान, जारंगडीह भूमिगत खदान, गोविंदपूर यूजी माइंस, बेरमो सीएम इंकलाइन, गोविंदपुर फेज दो यूजी माइंस, केएसपी भूमिगत खदान, कारो सीम इ्ंकलाइन, करगली सीम थ्री इंकलाइन, ढोरी खास 4.5.6 इंकलाइन शामिल हैं. इसके अलावा सीसीएल की करगली कोल वाशरी और बीसीसीएल की दुगदा कोल वाशरी भी बंद हो गयी. सीसीएल ढोरी एरिया अंतर्गत एसडीओसीएम परियोजना का सीएचपी (कोल हैंडलिंग प्लांट) 23 मई 2017 से बंद है. वर्ष 1985 में इस प्लांट की नींव रखी गयी थी. आइसीएस नामक कंपनी ने इसे बनाया था. वर्ष 1991 से यहां कोल क्रशिंग का काम विधिवत शुरू हुआ था. सीएचपी में मेसर्स चिरुडीह सहयोग श्रमिक सहयोग समिति लि. के मातहत सभी 140 मजदूरों ने 23 मार्च 1995 से लेकर 23 मई 2016 तक लगातार 22 वर्षों तक सेवा दी थी.

खंडहर बन गया कथारा का सीपीपी

सीसीएल के कथारा एरिया में करोड़ों रुपये की लागत से बना कैप्टिव पावर प्लांट (सीपीपी) भी बंद हो गया. इस प्लांट की दो यूनिट से 20 मेगावाट बिजली उत्पादन होता था. बीएचइएल कंपनी ने इस प्लांट का निर्माण कर 1995 में सीसीएल प्रबंधन को सौंपा था. सीसीएल के देख-रेख में लगभग दस वर्षों तक किसी तरह प्लांट चला. इसके बाद 20 वर्षों के लिए इम्पेरियाल फास्टनर्स पावर लिमिटेड नामक कंपनी को दे दिया गया. जीएसटी का अतिरिक्त भार बढ़ जाने और कोयला की दरों में वृद्धि काे कारण बताते हुए इस कंपनी ने मार्च 2018 मार्च में इस प्लांट को बंद कर दिया. इससे तीन सौ मजदूर काम से बैठ गये. फिलहाल इस प्लांट के सारे कीमती पार्ट्स-पूर्जे लोहा तस्कर ले गये और प्लांट खंडहर सा बन गया है.

आठ साल से बंद है डीवीसी बेरमो माइंस

डीवीसी की बेरमो माइंस में आठ साल से कोयला उत्पादन व ओबी रिमूवल का काम ठप है. एक मई 2018 को दिल्ली में मिनिस्ट्री ऑफ पावर तथा मिनिस्ट्री ऑफ कोल के वरीय अधिकारियों की बैठक में इस माइंस को सीसीएल में मर्ज करने पर सहमति बनी. लेकिन छह माह बाद उर्जा मंत्री ने इस माइंस को खुद डीवीसी को चलाने की बात कही. इस पर कोई अमल नहीं हुआ. बाद में सीसीएल ने इसे चलाने के लिए उद्घाटन किया. लेकिन इसके चार साल बाद भी सारा काम ठप है. इस माइंस के ओल्ड कॉलोनी के नीचे सीम में करीब 20 मिलियन टन कोकिंग कोल है.

तीन दशक के बाद भी चालू नहीं हो पाया साड़म हाइडल प्लांट

गोमिया प्रखंड में साड़म हाइडल प्लांट तीन दशक के बाद चालू नहीं हो पाया. तेनुघाट सिंचाई विभाग द्वारा क्षेत्र में कृषि विकास के लिए एक मेगावाट क्षमता वाले इस प्लांट का निर्माण का काम वर्ष 1990 में वेस्टन क्रम्पटन कंपनी को मिला था. प्लांट बनने के बाद विशेषज्ञों द्वारा टेस्ट भी किया गया. तत्कालीन उर्जा सचिव विमल कीर्ति सिंह ने इस दिशा में पहल की थी. लेकिन विडंबना की बात है कि बिहार व झारखंड के बीच स्वामित्व को लेकर हुए विवाद के कारण आज तक यह प्लांट चालू नहीं हो पाया. अब रखरखाव के अभाव में यह प्लांट जर्जर हो गया है. कीमती सामानों की चोरी हो गयी.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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