एलपीजी मिलना हुआ कठिन, मिट्टी के चूल्हे पर पक रहा स्वाद व सेहतमंद भोजन

गांवों में यह बदलाव दिखाता है कि कैसे लोग परिस्थितियों के अनुसार अपनी जीवनशैली को ढालते हैं
-गैस संकट के बीच ग्रामीण महिलाओं ने पुरानी परंपरा को फिर से किया जीवंत सुपौल. एलपीजी गैस की बढ़ती कीमतों और समय-समय पर हो रही किल्लत के बीच अब गांवों में एक पुरानी परंपरा फिर से जीवित होती नजर आ रही है. आधुनिक रसोई से हटकर लोग दोबारा मिट्टी के चूल्हे की ओर लौट रहे हैं. खास बात यह है कि यह बदलाव केवल मजबूरी नहीं, बल्कि अब धीरे-धीरे एक पसंद और जीवनशैली का हिस्सा बनता जा रहा है. गांवों में महिलाएं फिर से लकड़ी और उपले के सहारे चूल्हे पर खाना बना रही हैं. इससे न केवल एलपीजी गैस की बचत हो रही है, बल्कि खाने के स्वाद में भी खास बदलाव देखने को मिल रहा है. गृहिणी सोनी देवी बताती हैं, गैस की कीमत बहुत बढ़ गई है, ऊपर से कभी-कभी सिलेंडर समय पर नहीं मिलता. ऐसे में हमने फिर से चूल्हा जलाना शुरू किया. चूल्हे पर बना खाना ज्यादा स्वादिष्ट लगता है और घर का खर्च भी कम हो गया है. वहीं आरती देवी का कहना है, पहले तो लगा कि चूल्हे पर खाना बनाना मुश्किल होगा, लेकिन अब आदत हो गई है. दाल, चावल और सब्जी का स्वाद बिल्कुल अलग आता है. बच्चों को भी यह खाना ज्यादा पसंद आ रहा है. सेहत के लिए भी फायदेमंद मिट्टी के चूल्हे पर धीरे-धीरे पकने वाला भोजन न केवल स्वाद में बेहतर होता है, बल्कि सेहत के लिए भी लाभकारी माना जा रहा है. गांव की कमला देवी कहती हैं, चूल्हे पर खाना धीरे-धीरे पकता है, जिससे पोषक तत्व बने रहते हैं. गैस के तेज आंच में ऐसा नहीं हो पाता. अब खाना खाने के बाद पेट भी हल्का लगता है और पाचन भी अच्छा हो रहा है. केवल महिलाएं ही नहीं, बल्कि गांव के पुरुष भी इस बदलाव से खुश नजर आ रहे हैं. ललन यादव बताते हैं, चूल्हे पर बनी रोटी और सब्जी का स्वाद अलग ही होता है. ऐसा लगता है जैसे पुराने दिनों में लौट आए हों. घनश्याम मंडल का कहना है, अब गैस की चिंता नहीं रहती. लकड़ी गांव में आसानी से मिल जाती है. खर्च कम हो गया है और खाना भी ज्यादा स्वादिष्ट मिलता है. वहीं दिलीप कुमार कहते हैं, चूल्हे का खाना खाने से पेट भी ठीक रहता है. पहले गैस के खाने से कभी-कभी दिक्कत होती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं होता. आर्थिक मजबूती का जरिया गैस सिलेंडर की कीमतों में लगातार हो रही वृद्धि ने ग्रामीण परिवारों के बजट पर असर डाला है. ऐसे में मिट्टी का चूल्हा उनके लिए एक सस्ता और सुलभ विकल्प बनकर उभरा है. लकड़ी और उपले स्थानीय स्तर पर उपलब्ध होने के कारण खर्च काफी कम हो गया है. पर्यावरण से भी जुड़ाव हालांकि चूल्हे के धुएं को लेकर कुछ चिंताएं भी हैं, लेकिन कई ग्रामीण अब पारंपरिक चूल्हे को आधुनिक तरीके से सुधारकर कम धुआं निकालने वाले विकल्प भी अपना रहे हैं. इससे पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों का संतुलन बनाए रखने की कोशिश की जा रही है. गांवों में यह बदलाव दिखाता है कि कैसे लोग परिस्थितियों के अनुसार अपनी जीवनशैली को ढालते हैं. जहां एक ओर एलपीजी गैस ने रसोई को आधुनिक बनाया, वहीं अब चूल्हे की वापसी ने लोगों को अपनी जड़ों से फिर जोड़ दिया है. आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह परंपरा कितनी स्थायी बनती है, लेकिन फिलहाल गांवों में चूल्हे की आंच फिर से जीवन में गर्माहट घोल रही है.
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