आरटीआइ को ले संतोष पर हुआ था रंगदारी का मुकदमा

संतोष नियमित तौर पर आरटीआइ के माध्यम से सरकारी महकमे के काले कारनामों को सामने लाते रहते हैं. इसी को लेकर उसे रंगदारी मांगने के फर्जी मुकदमे में फंसा दिया गया. सुपौल/त्रिवेणीगंज : आरटीआइ यानि सूचना का अधिकार. कोर्ट से लेकर सरकार तक मानती है कि सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 जब से लागू हुआ, […]
संतोष नियमित तौर पर आरटीआइ के माध्यम से सरकारी महकमे के काले कारनामों को सामने लाते रहते हैं. इसी को लेकर उसे रंगदारी मांगने के फर्जी मुकदमे में फंसा दिया गया.
सुपौल/त्रिवेणीगंज : आरटीआइ यानि सूचना का अधिकार. कोर्ट से लेकर सरकार तक मानती है कि सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 जब से लागू हुआ, धीरे-धीरे सरकारी कार्यालयों में आवेदन की तादाद बढ़ती जा रही है. आलोचकों का दावा है कि इससे सरकारी कार्य भी बाधित होती है. लिहाजा संशोधन पर भी विचार हो रहा है. लेकिन आरटीआइ दाखिल करना और सूचना प्राप्त कर लेना भी आसान नहीं है. क्योंकि आरटीआइ दाखिल करने पर अधिकारी अगर बेचैन हुए तो संभव है कि आपके विरुद्ध रंगदारी का मुकदमा दर्ज करा दिया जाये.
बुधवार को जिला मुख्यालय में निगरानी पुलिस की कार्रवाई मामले में सूचक संतोष कुमार की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. दरअसल संतोष का कुसुर केवल इतना है कि वह नियमित तौर पर आरटीआइ के माध्यम से सरकारी महकमे के काले कारनामों को लोगों के सामने लाता रहता है. उसकी इसी आदत का परिणाम रहा कि 11 अगस्त 2016 को उसके विरुद्ध त्रिवेणीगंज थाना कांड संख्या 165/16 दर्ज करा दिया गया. सूचक रेफरल अस्पताल के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डाॅ इंद्रदेव यादव का आरोप है कि लालपट्टी निवासी संतोष स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी व कर्मियों से दो लाख रुपये प्रतिमाह की रंगदारी मांगता है
और फर्जी मुकदमे में फंसाने की धमकी देता है. इसके अलावा उस पर सरकारी कार्य में बाधा डालने व स्वास्थ्य कर्मियों से गाली-गलौज करने का भी आरोप है. लेकिन दिलचस्प यह है कि इससे पूर्व सात अगस्त को ही कांड के आरोपी सह आरटीआइ कार्यकर्ता संतोष कुमार ने थाना को लिखित शिकायत दर्ज करायी थी. जिसमें इस बात की आशंका जतायी गयी थी कि स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों द्वारा अनियमितता के उद्भेदन के कारण उसे फर्जी मुकदमे में फंसाया जा सकता है. लेकिन पुलिस ने न तो मुकदमा दर्ज किया न ही सनहा दर्ज किया गया. जाहिर है, शुरुआत से ही पुलिस की भूमिका एकपक्षीय दिख रही थी. हालांकि जब संतोष के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज हुई, तभी से चर्चा आम है कि आरटीआइ की सौगात में ही उसे प्राथमिकी मिली है.
चिकित्सा पदाधिकारी की कारगुजारी का किया था उद्भेदन
संतोष के विरुद्ध मुकदमा की चर्चा बाजार में इसलिए भी थी कि उसने चिकित्सा पदाधिकारी के कारगुजारियों का उद्भेदन आरटीआइ के माध्यम से किया था. इसके तहत कोरियापट्टी पीएचसी में सितंबर 2014 से मई 2015 के बीच आउटसोर्सिंग कंपनी के रूप में एक एनजीओ को अवैध तरीके से करीब 1.50 रुपये के भुगतान का मामला उजागर किया गया था. वही 11 नवंबर से 12 दिसंबर 2015 के बीच प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी अवकाश पर थे और बायपास सर्जरी के लिए दिल्ली गये हुए थे. इस बीच परिवार कल्याण ऑपरेशन हुआ. जिसमें डॉ सीवी मंडल व डाॅ हरेंद्र कुमार आर्य द्वारा बंध्याकरण किया गया. लेकिन चिकित्सा पदाधिकारी श्री यादव जब अवकाश से लौटे, उन्होंने पंजी पर अपनी उपस्थिति दर्ज की और बंध्याकरण का पूरा भुगतान स्वयं प्राप्त कर लिया. इसकी शिकायत संतोष द्वारा अनुमंडल लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी के कार्यालय में की गयी. जिसके बाद उक्त राशि चिकित्सा पदाधिकारी ने चेक के माध्यम से विभाग को वापस लौटा दिया. इसके अलावा अन्य कई छोटे-बड़े मामलों का उद्भेदन भी संतोष ने आरटीआइ से किया था.
पहली डायरी जमा कराने के लिए दारोगा ने लिये थे तीन हजार
रंगदारी और सरकारी कार्य में बाधा उत्पन्न करने के आरोप में त्रिवेणीगंज थाना कांड संख्या 165/16 दर्ज होने के बाद संतोष ने 28 फरवरी 2017 को पटना उच्च न्यायालय से अग्रिम जमानत लिया. इसके उपरांत मार्च माह के प्रथम सप्ताह में व्यवहार न्यायालय सुपौल से उसने नियमित जमानत भी ले लिया. लेकिन उसकी असल परेशानी पुलिस का लचर रवैया था. संतोष की मानें तो मुकदमे की पहली केस डायरी कोर्ट में जमा कराने के लिए भी दारोगा विमल होरो द्वारा उससे अवैध रूप से तीन हजार रुपये वसूल किये गये थे. वही इस बार दूसरी डायरी कोर्ट में पेश करनी थी. जिसके लिए उससे 10 हजार रुपये की मांग की गयी थी. यही कारण रहा कि उसने 06 अप्रैल को आशय की लिखित शिकायत निगरानी पुलिस से कर दी. उसने सभी आरोपों को भी मनगढ़ंत बताया है. साथ ही कहा है कि पुलिस जांच में भी जब उसके विरुद्ध कोई साक्ष्य नहीं मिला है तो उससे मदद के नाम पर अवैध तरीके से राशि की मांग बार-बार की जा रही है. गौरतलब है कि मुकदमे में कुल तीन केस डायरी जमा होना है.
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