...तो क्या बिना निबंधन ही चलेंगे जिले के कोचिंग संस्थान

Published at :05 Apr 2017 6:09 AM (IST)
विज्ञापन
...तो क्या बिना निबंधन ही चलेंगे जिले के कोचिंग संस्थान

31 मार्च तक होना था निजी कोचिंग संस्थानों का पंजीयन मंत्री ने की है सदन में घोषणा, करेंगे कार्रवाई, लटकेगा ताला सुपौल : सत्ता बोलती है और प्रशासनिक अमले की सामान्य तौर पर देश में सत्ता के हर आदेश का अनुपालन कराने की जिम्मेवारी होती है. लेकिन बाजारीकरण के दौर में सबसे अधिक ह्रास शिक्षा […]

विज्ञापन

31 मार्च तक होना था निजी कोचिंग संस्थानों का पंजीयन

मंत्री ने की है सदन में घोषणा, करेंगे कार्रवाई, लटकेगा ताला
सुपौल : सत्ता बोलती है और प्रशासनिक अमले की सामान्य तौर पर देश में सत्ता के हर आदेश का अनुपालन कराने की जिम्मेवारी होती है. लेकिन बाजारीकरण के दौर में सबसे अधिक ह्रास शिक्षा व्यवस्था का हुआ है और इसमें कोई शक नहीं है कि बीते वर्षों में शिक्षा से बड़ा और फायदेमंद कोई दूसरा कारोबार नहीं रहा है. नतीजा है कि रोजाना हर गली, नुक्कड़ और चौबारे में एक के बाद एक शिक्षण संस्थान खुलते जा रहे हैं. दीगर बात है कि यहां न तो मानको का अनुपालन होता है और न ही नियम कायदों की किसी को परवाह है. शिक्षण संस्थानों में सबसे अधिक तादात निजी कोचिंग संस्थान की है. जो दिन दोगुनी,
रात चौगुनी की रफ्तार से बढ़ रहे हैं. सरकार भी इस बात को जानती है और समय-समय पर विभागीय आदेश के माध्यम से सख्ती दिखाने का प्रयास भी होता है. लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि जिले में अब तक न तो बिहार कोचिंग रेगुलेशन एक्ट 2010 के तहत निगरानी समिति का गठन हुआ है और न ही इसके प्रावधानों की किसी को जानकारी है. दिलचस्प यह है कि एक्ट के प्रावधानों के अनुसार खुद जिलाधिकारी को पदेन अध्यक्ष घोषित किया गया है. जबकि एसपी समिति के पदेन उपाध्यक्ष व जिला शिक्षा पदाधिकारी पदेन सचिव घोषित हैं. चौथा सदस्य जिला मुख्यालय के प्रस्वीकृत महाविद्यालय का प्रधान होता है. एक से अधिक महाविद्यालय होने की स्थिति में रोटेशन पॉलिसी के तहत यह सदस्य हर वर्ष बदलना होता है. लेकिन सुपौल में बीएसएस कॉलेज एकमात्र प्रस्वीकृत महाविद्यालय है. बावजूद नियमावली लागू होने के सात वर्ष बाद भी समिति का गठन नहीं होना प्रशासनिक गंभीरता की पोल खोलता है.
प्रशिक्षित शिक्षकों को ही कोचिंग चलाने की अनुमति : बिहार कोचिंग रेगुलेशन एक्ट 2010 के प्रावधानों में स्पष्ट किया गया है कि संस्थान संचालन के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता अनिवार्य है. किसी भी स्थिति में अप्रशिक्षित शिक्षक अथवा शिक्षकों के माध्यम से कोचिंग संचालन की अनुमति नहीं दी जा सकती है. दरअसल इस प्रावधान का मूल उद्देश्य कोचिंग संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना है. इसके अलावा प्रोस्पेक्टस से लेकर अध्यापन फीस संबंधी सूचना भी सूचना पट पर सार्वजनिक करने का निर्देश है. जिसके मूल में तथ्य यह है कि अभिभावक अथवा छात्रों का आर्थिक दोहन न किया जा सके.
…अब शिक्षा मंत्री के दावे का क्या ! : ‘अवैध कोचिंग संस्थानों पर सरकार सख्त है और 31 मार्च तक निबंधन के दायरे में जो संस्थान नहीं आये हैं, उन पर ताला लटक जायेगा’. यह दावा सूबे के शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी ने शुक्रवार को विधान परिषद में किया. लेकिन तब शायद उन्हें इस बात का इल्म नहीं रहा होगा कि जिस आदेश का हवाला देते हुए वे यह दावे कर रहे थे, दरअसल उसके अनुपालन के लिए सुपौल जिले के तमाम अधिकारियों ने एक कदम तक आगे नहीं बढ़ाया. बल्कि पंजीयन के लिए जो कोचिंग संचालक जिला शिक्षा विभाग के चक्कर लगा रहे थे, उन्हें भी बिना कोई जानकारी दिये उल्टे पांव वापस कर दिया गया. दरअसल दिसंबर माह के प्रथम सप्ताह में ही मंत्री ने विभागीय अधिकारियों को कोचिंग संस्थानों के पंजीयन में तेजी लाने का निर्देश दिया था. जिसमें पहले 31 दिसंबर तक की समय सीमा तय की गयी और फिर बाद में इसे 31 मार्च तक के लिए विस्तार दे दिया गया. लेकिन प्रशासनिक बदइंतजामी का मंजर यह है कि अब तक जिले में एक भी कोचिंग संस्थानों का निबंधन नहीं हो सका है. जबकि अधिकारियों का हाल यह है कि उन्हें स्वयं अपने अधिकारों की जानकारी तक नहीं है. यही कारण रहा कि जब आदेश के बाद कुछ कोचिंग संचालक निबंधन के लिए डीइओ कार्यालय पहुंचे थे, उनसे एसएसए कार्यालय और वहां से वापस डीइओ कार्यालय के बीच दौड़ लगवायी गयी. बाद में थक-हार कर कोचिंग संचालक वापस लौट गये. लेकिन एक बार फिर जब मंत्री का आदेश जारी हुआ है, संचालकों को खलबली मच गयी है. जिसे स्वाभाविक भी माना जा सकता है.
10 से अधिक बच्चों पर अनिवार्य है पंजीयन
बिहार कोचिंग रेगुलेशन एक्ट मार्च 2010 में पारित है. जिसके तहत 10 से अधिक छात्रों को शिक्षा प्रदान करने वाले शिक्षक अथवा संस्थानों को एक्ट के दायरे में रखा गया है. इसके तहत 10 से अधिक छात्रों को पढ़ाने के लिए संबंधित कोचिंग संचालक के लिए पंजीयन अनिवार्य किया गया. पंजीयन के लिए आवश्यक संसाधन की उपलब्धता सुनिश्चित करने के बाद पांच हजार रुपये का डिमांड ड्राफ्ट व आवेदन जिला शिक्षा पदाधिकारी के कार्यालय में लिया जाना था. संसाधनों में कमरे में बच्चों के बैठने के लिये पर्याप्त स्थान, बेंच-डेस्क, श्याम पट्ट अथवा व्हाइट बोर्ड, लड़का व लड़की के लिए अलग-अलग शौचालय, पेयजल की समुचित व्यवस्था, कॉमन रुम, पुस्तकालय, साइकिल या वाहन स्टैंड आदि शामिल हैं. इसके अलावा स्वच्छता का भी पूरा ख्याल रखा जाना अनिवार्य बताया गया है. प्रावधान के तहत कोचिंग संस्थान वैसे कमरों में ही चलाये जा सकते हैं जहां रोशनी व हवा की पर्याप्त व्यवस्था हो. आगमन-प्रस्थान के लिए उचित मार्ग हो. साथ ही प्रारंभिक उपचार की व्यवस्था और अन्य मूलभूत सुविधाओं का होना आवश्यक बताया गया है.
आप इस संदर्भ में एसएसए डीपीओ से बात कर लें. वही कोचिंग संस्थानों के बाबत जानकारी दे सकते हैं. समिति गठन का क्या प्रावधान है, इसकी जानकारी नहीं है. नियमावली देखने के उपरांत ही कुछ भी स्पष्ट बताया जा सकता है.
मो हारुण, जिला शिक्षा पदाधिकारी, सुपौल
कोचिंग संस्थानों के निबंधन अथवा कार्रवाई के बाबत कोई पत्र प्राप्त नहीं हुआ है. थोड़ा इंतजार करें. पत्र प्राप्त होने पर जो भी विधि सम्मत कार्रवाई होगी, की जायेगी.
बैद्यनाथ यादव, जिलाधिकारी, सुपौल
विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन