सीडीपीओ नहीं कर रहीं उच्चाधिकारी के आदेश का पालन
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :09 Mar 2017 8:44 AM (IST)
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सुपौल : जिले भर के सभी प्रखंडों में कार्यरत बाल विकास परियोजना पदाधिकारियों द्वारा आइसीडीएस कार्यालय के निर्देश का ससमय अनुपालन नहीं किया जा रहा है. आलम यह है कि वर्ष 2016 के अगस्त माह में सभी सीडीपीओ को सेविकाओं के प्रमाणों के सत्यापन कराये जाने का दायित्व प्रोग्राम पदाधिकारी द्वारा सौंपा गया था. लेकिन […]
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सुपौल : जिले भर के सभी प्रखंडों में कार्यरत बाल विकास परियोजना पदाधिकारियों द्वारा आइसीडीएस कार्यालय के निर्देश का ससमय अनुपालन नहीं किया जा रहा है. आलम यह है कि वर्ष 2016 के अगस्त माह में सभी सीडीपीओ को सेविकाओं के प्रमाणों के सत्यापन कराये जाने का दायित्व प्रोग्राम पदाधिकारी द्वारा सौंपा गया था. लेकिन छह माह बीत जाने के बाद भी सीडीपीओ के द्वारा नहीं कराया जा सका है.
इसे सीडीपीओ की उदासीनता कहें या कुछ और. आखिरकार इसका प्रतिकूल असर योजना के संचालन पड़ ही दिख रहा है. वहीं सीडीपीओ के इस रवैये से तीन से छह वर्ष तक के बच्चे, धात्री व गर्भवती महिलाओं के लिए संचालित सरकारी योजनाओं का लाभ सहजता से नहीं मिल पा रहा है. साथ ही केंद्र के लिए स्थायी भवन का अभाव संचालन के मार्ग में बड़ी बाधा साबित होने लगी है. भाड़े पर संचालित केंद्र के किराया के साथ-साथ कर्मियों के मानदेय भुगतान में होने वाली देरी अपने वास्तविक उद्देश्य से भटकता जा रहा है. जिले के सभी प्रखंडों में कुल 1983 केंद्र संचालित है. जहां 117 केंद्रों पर सेविकाओं का चयन नहीं कराया गया है.
1983 आंगनबाड़ी केंद्र हैं संचालित
मालूम हो कि जिले भर में 1983 आंगनबाड़ी केंद्र संचालित है. जिसमें 1850 सामान्य व 133 मिनी आंगनबाड़ी केंद्र शामिल है. जहां 117 केंद्र सेविका विहीन है. साथ ही 96 ऐसे केंद्र संचालित है. जहां सहायिकाओं का पद रिक्त पड़ा हुआ है. विभागीय सूत्रों के अनुसार रिक्त पदों की बहाली की प्रक्रिया पूर्ण कराये जाने हेतु संबंधित रिपोर्ट विभाग को भेज दी गयी है. इस मामले में अब तक विभाग द्वारा मार्गदर्शन नहीं भेजा गया है. साथ ही जिले भर में कुल 334 आंगनबाड़ी केंद्र को अपना भवन नसीब है. वहीं 258 केंद्र निर्माणाधीन है. जबकि 915 केंद्रों के लिए अब तक जमीन भी मुहैया नहीं कराया गया है.
विभागीय सूत्रों की माने तो कुल 1649 आंगनबाड़ी केंद्र भवनहीन है. उक्त केंद्र का संचालन या तो सामुदायिक भवन, पंचायत भवन सहित किराये पर संचालित हो रहा है. किराये के मकानों में केंद्र का संचालन स्थायी तौर पर नहीं हो सकता है. मकान मालिक जब चाहें केंद्र को खाली करवा लेते हैं.
केंद्र अन्यत्र संचालित किया जाने से पोषक क्षेत्र के गिने चुने बच्चे ही इन केंद्रों पर पहुंच पाते हैं. किराये के भवन में संचालित केंद्र की स्थिति तो और भी खराब है. कहीं तो बिना छत व मुक्कमल दीवार के ही केंद्र का संचालन किया जा रहा है, या कहीं किसी दीवार के किनारे बैठ कर ही केंद्र संचालिका अपने दायित्वों को जैसे तैसे अंजाम देने में लगी है.
किराया के लिए मिलता है दो सौ रुपये
महंगाई के दौर में सरकार व विभाग द्वारा आंगनबाड़ी केंद्रों को किराया के नाम पर महज दो सौ रुपये मुहैया कराया जा रहा है. जानकारों ने बताया कि सरकार द्वारा बाल विकास के तहत संचालित योजना स्कूल पूर्व शिक्षार्थियों के साथ एक क्रूर मजाक बना हुआ है. बताया कि अधिकांश आंगनबाड़ी केंद्र असुरक्षित है. जिस कारण बच्चों को मिलने वाले संस्कार किसी यातना से कम नहीं है. बताया कि ऐसे बच्चों को गरमी के दिनों में धूप से जूझने पर विवश होना पड़ता है.
वहीं बरसात के मौसम में पानी का सामना तथा जाड़े के मौसम में ठंड का सामना करना पड़ता है. बताया कि विभाग द्वारा विद्यालयों के ऊपर करोड़ों अरबों की राशि खर्च कर अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस कराया गया. जबकि आंगनबाड़ी केंद्र के प्रति उपेक्षाहीन बरताव किया जा रहा है.
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