लीखि पठाओल आखर का प्रकाशन प्रीतिकर

सुपौल : पत्र-लेखन लगभग खत्म हो गया है. इंटरनेट व मोबाइल ने पत्राचार संस्कृति को ही नष्ट कर दिया है. यह एक तरह से हमारे वैयक्तिक जीवन और साहित्यिक सरोकारों को हाशिये पर ला कर खड़ा कर दिया है. ऐसे में डॉ भीमनाथ झा को विभिन्न लेखकों द्वारा लिखे गये पत्रों के संग्रह का आना […]
सुपौल : पत्र-लेखन लगभग खत्म हो गया है. इंटरनेट व मोबाइल ने पत्राचार संस्कृति को ही नष्ट कर दिया है. यह एक तरह से हमारे वैयक्तिक जीवन और साहित्यिक सरोकारों को हाशिये पर ला कर खड़ा कर दिया है. ऐसे में डॉ भीमनाथ झा को विभिन्न लेखकों द्वारा लिखे गये पत्रों के संग्रह का आना अत्यंत प्रीतिकर है.
डॉ दमन कुमार झा द्वारा चयनित व संकलित ‘लीखि पठाओल आखर’ में एक सौ 35 लेखकों के पत्र संकलित है. उक्त बातें किसुन संकल्प लोक सुपौल द्वारा आयोजित विचार गोष्ठी में रविवार को हिंदी-मैथिली के चर्चित लेखक डॉ सुभाष चंद्र यादव ने कही. गोष्ठी में उपस्थित प्रो कृपानंद झा ने कहा कि साहित्य अकादेमी व प्रबोध साहित्य सम्मान से नवाजे गये डॉ भीमनाथ झा अपने साहित्य अवदानों को लेकर अत्यंत लोकप्रिय रहे हैं. नवोदित पीढ़ी के सक्रिय रचनाकार आशीष चमन ने कहा कि इन पत्रों से गुजरने पर एक विलक्षण अनुभव का अहसास होता है. यह किताब वास्तविक अर्थों में महत्वपूर्ण और पठनीय है.
कवि-कथाकार केदार कानन ने कहा कि भीमनाथ झा मैथिली साहित्य के उन्नायकों में एक रहे हैं. वे इतने सहज-सरल स्वभाव के मिलनसार लेखक हैं कि उनसे सब को पटती रही है. चाहे कवि चूड़ामणि मधुप हों या हास्य-व्यंग्य के पुरोधा प्रो हरिमोहन झा अथवा आधुनिक पीढ़ी के समस्त नामचीन लेखक या एकदम टटकी पीढ़ी के लेखक-पत्रकार. यह किताब एक जीवंत दस्तावेज है. तत्कालीन साहित्यिक हलचलों से भरी एक ऐतिहासिक ग्रंथ की तरह, जिसे सभी पढ़ना चाहेंगे. अंत में अध्यक्षता कर रहे प्रो धीरेंद्र धीर ने कहा कि इस किताब से साहित्यिक और सांस्कृतिक दरस-परस मिलती है. इस अनूठे प्रकाशन के लिए भीमनाथ झा सचमुच बधाई के पात्र हैं. गोष्ठी में उपस्थित मणि झा, मो अख्तर हुसैन, असित किशोर एवं प्रो राजेंद्र झा, धीरेंद्र सूरज ने भी अपने विचार प्रकट किये.
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