कृषि परक समृद्धि, ऋतु परिवर्तन व भावात्मक एकता का प्रतीक है मकर संक्रांति

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 13 Jan 2016 6:38 PM

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कृषि परक समृद्धि, ऋतु परिवर्तन व भावात्मक एकता का प्रतीक है मकर संक्रांति फोटो – 8 व 9कैप्सन – दुकान पर सजा तिल कूट व खरीदारी कर लौट रहे ग्राहकत्योहार से नियमित क्रियाकलापों की शिथिलता होती है दूरतिल संक्रांति से नवजीवन का होता है संचारयह त्योहार अमीर व गरीब के बीच की विषमता के बांध […]

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कृषि परक समृद्धि, ऋतु परिवर्तन व भावात्मक एकता का प्रतीक है मकर संक्रांति फोटो – 8 व 9कैप्सन – दुकान पर सजा तिल कूट व खरीदारी कर लौट रहे ग्राहकत्योहार से नियमित क्रियाकलापों की शिथिलता होती है दूरतिल संक्रांति से नवजीवन का होता है संचारयह त्योहार अमीर व गरीब के बीच की विषमता के बांध को करता है समाप्तसूर्य के मकर राशि में प्रवेश होने पर मनाया जाता है त्योहारशिवानंद मिश्रा, सुपौल सामाजिक समरसता का त्योहार मकर संक्रांति को लेकर जिले भर में खुशी का माहौल है. त्योहार मनाये जाने को लेकर शहर वासी सहित ग्रामीण क्षेत्रों के लोग खरीदारी में जुटे हुए हैं. इस त्योहार में तिल की विशेष महत्ता होती है. इससे इसे तिल संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है. यह त्योहार जितना व्यक्तिगत उत्कर्ष को याद दिलाता है, उससे कहीं अधिक सामाजिक समरसता संबंधी जन चेतना को भी विकसित करता है. यह त्योहार समन्वय वाद का प्रमुख स्थल है. इसे सभी लोग एक समान तरीके से मनाते रहे हैं. मकर संक्रांति का त्योहार कृषि परक समृद्धि, ऋतु परिवर्तन व भावात्मक एकता का भी प्रतीक रहा है. त्योहार से होता है नवजीवन का संचार मिथिलांचल समाज में त्योहारों का विशेष महत्व रहा है. मान्यताएं रही हैं कि मकर संक्रांति के त्योहार लोगों के दैनिक जन जीवन से जुड़ा है. इस त्योहार को नियम पूर्वक विधान के साथ मनाये जाने से लोगों के नियमित क्रियाकलापों की शिथिलता दूर होती है. साथ ही मनुष्य में नवजीवन का संचार होता है. इस त्योहार से हमारी संस्कृति को भी सुरक्षा प्रदान होता है. साथ ही सुख व खुशी की उत्प्रेरक शक्ति का कोष भी कायम होता है. सूर्यदेव का मकर राशि में प्रवेश ज्योतिष विज्ञान के अनुसार, आकाश मंडल में 12 राशि विद्यमान हैं. इसमें मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ व मीन शामिल हैं. उक्त सभी राशि का वर्ष भर में सूर्यदेव द्वारा चक्कर लगाया जाता है. यात्रा के दौरान जिस दिन सूर्य का मकर राशि में प्रवेश होता है, उक्त तिथि को मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाता रहा है. अमूमन प्रति वर्ष 14 जनवरी को ही तिल संक्रांति मनाये जाने की परंपरा रही है, लेकिन कुछ वर्ष के अंतराल पर तिथि में फेरबदल होता रहता है. इस फेरबदल के कारण कभी-कभार 15 जनवरी को त्योहार का आयोजन किया जाता है. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से त्योहार की महत्तावैज्ञानिक दृष्टि से सूर्य के आकाश मंडल में चक्कर काटने के क्रम में स्थान परिवर्तन होता रहता है. जहां सूर्य के मकर राशि में आने पर दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर उतरना प्रारंभ होते ही धरती पर ऋतु परिवर्तन की स्थिति बनती रही है. वहीं कृषि वैज्ञानिक उक्त समय में उगाये जाने वाले फसल गेहूं, मक्का, आलू, आदि सहित अन्य रबी फसलों की उत्तर- दक्षिण वाले कतारों को उत्तम माना है. इनके अनुसार फसलों के उत्तर- दक्षिण की कतार रहने से प्रकाश संश्लेषण क्रिया तीव्र होती है. पौधे को पर्याप्त प्रकाश व ताप मिलने से भोजन मिलने में आसानी होता है. उक्त जानकारी से प्रतीत होता है कि इस त्योहार से कृषि व विज्ञान के बीच भी गहरा संबंध है.विषमता की बांध को तोड़ता है त्योहारअमीर हो या गरीब या फिर उच्च हो या निम्नवर्गीय. त्योहार का विधान ही ऐसा है कि त्योहार में उपयोग की जाने वाली सामग्री समाज की विषमता के बांध को भी तोड़ देती है. इस त्योहार में प्रत्येक समाज के लोग स्थान विशेष अनुरूप लोगों को खिचड़ी तथा दही, चूड़ा व तिलकूट खिलाते हैं. साथ ही स्वयं भी ग्रहण करते हैं. त्योहार में तिल का है विशेष महत्व पुराणों के अनुसार, तिल के दान का विशेष महत्व है. कर्मकांड के हरेक पुण्य कार्य में तिल का होना अनिवार्य होता है. तिल दान को पाप मुक्ति का कारक भी माना जाता है. वैज्ञानिकों ने भी तिल को कार्बोहाइड्रेट का धनी बताया है. इस कारण तिल के ग्रहण करने से जहां शरीर को ऊर्जा मिलती है, वहीं इसके सेवन से शरीर को गरमी भी मिलती है. तिल संक्रांति पर दान का विशेष महत्व संक्रांति के मौके पर श्रद्धालु गंगा स्नान को पुण्यदायी मानते हैं. इस कारण अधिसंख्य लोग गंगा नदी पहुंच कर स्नान करते हैं. साथ ही कतिपय कारणों से गंगा स्नान नहीं करने वाले श्रद्धालु समीप के सरोवर व नदी में ही स्नान कर ब्राह्मण भोजन करा ससामर्थ्य अनुरुप वस्त्र दान करते हैं. त्योहार के मौके पर सेठ साहुकार व जन प्रतिनिधियों द्वारा जगह जगह वस्त्रों का दान भी किया जाता रहा है.तिलकुट से सजा है बाजार मकर संक्रांति में तिल की प्रधानता को लेकर मुख्यालय बाजार सहित ग्रामीण क्षेत्र के बाजारों में व्यवसायियों द्वारा विविध प्रकार का तिलकुट सजाया गया है. मालूम हो कि त्योहार के मौके पर ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं द्वारा तिल को गुड़ व चीनी के साथ मिला कर तिलकुट व तिलवा बनाया जाता था. पर, आधुनिक दौड़ में बाजार में सभी प्रकार की सामग्री उपलब्ध रहने व समय के अभाव के कारण अब लोग बाजार से ही सामग्री की खरीदारी कर त्योहार मनाने को तरजीह दे रहे हैं. वहीं इस वर्ष मुख्यालय क्षेत्र में व्यवसायियों द्वारा दो सौ से साढ़े तीन सौ रुपये प्रति किलो के हिसाब से तिलकुट बिक रहा है.

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