लॉकडाउन में कोई पढ़ रहा साहित्य तो कोई लिख रहा है अधूरा पड़ा उपन्यास

कोरोना वायरस को लेकर देशभर में लगाये गये लॉकडाउन के तेरह दिन बीत चुके हैं. अभी भी दस रोज शेष बचा हुए हैं. लॉकडाउन के इस लंबे समय को घर में कैद होकर बिताना मुश्किल हो गया है.
बक्सर. कोरोना वायरस को लेकर देशभर में लगाये गये लॉकडाउन के तेरह दिन बीत चुके हैं. अभी भी दस रोज शेष बचा हुए हैं. लॉकडाउन के इस लंबे समय को घर में कैद होकर बिताना मुश्किल हो गया है. लेकिन, जिन लोगों की दोस्ती किताबों से है और सामाजिक कार्यों में रुचि रखते हैं. उनके लिए यह समय कोई बोझ की तरह नहीं है. प्रभात खबर अखबार ने शहर के साहित्यकारों और युवाओं से बातचीत कर लॉकडाउन के बिताये पलों को जाना.
अभी किताबों को पढ़ने में सबसे ज्यादा समय बिताया जा रहा है. जिनमें प्रमुख रूप से ब्रज कुमार पांडेय की किताब बीसवीं सदी का चिंतन, पीसी जोसी की आजादी की आधी सदी, लेखक शंभूनाथ की दूसरे नवजागरण की ओर, साहित्य का समाजशास्त्र जैसी किताबें पढ़ी गयी. इसके अलावे इतिहास में जातियों के रूपातंरण पर काम हो रहा है. पूंजीवादी दौर में जातियां कैसे बदल रहीं हैं. इस जल्द ही एक आलेख आयेगा. इससे कुछ समय बचाकर बागवानी भी कर लेता हूं. अभी कुछ किताबों को पढ़ा जाना बाकी है.
डॉ दीपक कुमार राय, इतिहासकार व समीक्षक, ज्यादातर समय गजट के साथ ही बीत रहा है. इन दिनों यु ट्यूब के माध्यम से नई-नई जानकारियां प्राप्त करने एवं नये-नये पुस्तक से रूबरू होने का मौका मिला है. यह समय हमारे लिए खुद को निखारने का एक मौका है. क्योंकि जिंदगी की रेस में आदमी बहुत व्यस्त हो गया है. अकेले में जीने का मजा ही कुछ और है.
माइकल पांडेय, विज्ञान शिक्षक, घर में रहकर इस समय मैं अपने साहित्यिक जीवन को पुनः जी रहा हूं. मैं खुद के उपन्यास पर काम कर रहा हूं जो समय की बाध्यता के कारण लंबे अरसे से अधूरा पड़ा था. इस लॉकडाउन में उपन्यास को पूरा करने की कोशिश की जा रही है. साथ साथ कुछ वक्त नयी किताबों को पढ़ने में समय दे रहा हूं. अपने साथियों के साथ प्रतिदिन चिह्नित बस्तियों में जाकर कोरोना महामारी से त्रस्त बेबस और लाचार लोगों को यथासंभव मदद करने की कोशिश रहती है.
राकेश राही, शिक्षककरोना एक वैश्विक महामारी है इससे बचाव के लिए लॉकडाउन बहुत जरूरी है. हम सबको लॉकडाउन का पालन करना चाहिए. इसके लिए हम सभी को अपने घरों में रहना चाहिए. कुछ किताबों के पढ़ने के साथ गृहिणियों के काम में हाथ भी बंटा रहा हूं. इसी के बहाने बच्चों के साथ ज्यादा समय बिताने का अवसर मिल रहा है. कुछ मित्रों से मोबाइल पर बातचीत भी हो रही है. हर रोज कोरोना के अपडेट को देखना डेली रूटीन में शामिल है
मो. सफी, रेलवे कर्मी, कोरोना से लेकर करूणा तक की बातें इन दिनों दिनचर्या में शामिल हो चुका है. अखबार पढ़ना और अपडेट लेना जीवन में पहले से भी शामिल है और अब भी जारी है. महीनों से पड़ी हुई कवि जगदीश नलिन का काव्य संग्रह ‘सपना साथ नहीं छोड़ता‘, के साथ दिन गुजर रहा है. कई कविताएं पढ़ जाता हूं. इसके अलावे मोबाइल से संपर्क कर भूख से लड़ते लोगों के मोर्चा संभालने का आग्रह करता हूं. ऐसे लोगों के बीच पहुंचकर मदद पहुंचाने की कोशिश जारी रहती है.
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By Prabhat Khabar News Desk
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