पौराणिक बाणेश्वरी अब नाले में तब्दील

पौराणिक इतिहास में ''बाणेश्वरी'' नदी के नाम से विख्यात और अपनी कल-कल बहती धारा के लिए प्रसिद्ध दाहा नदी धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खोती जा रही है. कभी सिंचाई और सांस्कृतिक गौरव का केंद्र रही यह नदी, पिछले एक दशक में अतिक्रमण और कचरे के कारण एक संकुचित नाले का रूप ले चुकी है. इसका पानी अब लगभग समाप्त होने की कगार पर है.
संवाददाता,सीवान. पौराणिक इतिहास में ””बाणेश्वरी”” नदी के नाम से विख्यात और अपनी कल-कल बहती धारा के लिए प्रसिद्ध दाहा नदी धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खोती जा रही है. कभी सिंचाई और सांस्कृतिक गौरव का केंद्र रही यह नदी, पिछले एक दशक में अतिक्रमण और कचरे के कारण एक संकुचित नाले का रूप ले चुकी है. इसका पानी अब लगभग समाप्त होने की कगार पर है. गौरवशाली अतीत और व्यापारिक महत्व बताया जाता है कि करीब एक शताब्दी पहले यह नदी जिले की जीवनरेखा थी. यह न केवल सभ्यताओं को जोड़ती थी, बल्कि परिवहन और व्यापार का भी प्रमुख साधन थी. इसी नदी के तट पर जिले का प्रसिद्ध चैनपुर बाजार विकसित हुआ. स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, जब सड़क और रेल मार्ग का विकास सीमित था, तब सरयू नदी से आने वाला माल जहाजों के जरिए दाहा नदी के रास्ते ही चैनपुर, रामगढ़, घुरघाट और मांझी तक पहुंचता था. 96 किमी लंबी यह सदाबहार नदी सिवान और गोपालगंज के लिए समृद्धि का आधार थी. जब नदी के जल से पकता था भोजन सिसवन प्रखंड के घुरघाट निवासी 90 वर्षीय लाल बाबू पांडे भावुक होकर बताते हैं कि 80 साल पहले नदी का पानी इतना शुद्ध था कि गांव के लोग इसका उपयोग भोजन पकाने के लिए करते थे. लोग नदी में स्नान करने के बाद बर्तनों में पानी भरकर घर लाते थे और उसी जल से दाल बनाई जाती थी. अस्तित्व पर मंडराता संकट 1980 के दशक के बाद से नदी की स्थिति बिगड़नी शुरू हुई. हैंडपंपों के आने और आधुनिकता की दौड़ में लोगों ने नदी से दूरी बना ली. देखते ही देखते अंधाधुंध अतिक्रमण, अवैध निर्माण और शहरी कचरे ने नदी का दम घोंट दिया. आज यह जलीय पारिस्थितिकी पूरी तरह नष्ट हो चुकी है. नदी अब जलकुंभी और औद्योगिक अवशेषों से पट गई है. आज दाहा नदी अपने खोए हुए गौरव को वापस पाने के लिए शासन और प्रशासन की ओर से जीर्णोद्धार की प्रतीक्षा कर रही है. यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह ऐतिहासिक धरोहर केवल दस्तावेजों तक सीमित रह जाएगी.
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