खंडहर में तब्दील हो गयी कुंभज की तपोभूमि
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :08 Oct 2015 12:19 AM (IST)
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कभी शिक्षा व लाचार जीवों की रक्षा के केंद्र के रूप में थी इसकी पहचान जलालपुर : एक जमाने में शिक्षा एवं लाचार जीवों की रक्षा के केंद्र के रूप में बहुचर्चित महर्षि कुंभज की तपोभूमि अब खंडहर में तब्दील हो गयी है. जिला मुख्यालय से लगभग 25 किमी उत्तर जलालपुर प्रखंड के पश्चिम मानसर […]
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कभी शिक्षा व लाचार जीवों की रक्षा के केंद्र के रूप में थी इसकी पहचान
जलालपुर : एक जमाने में शिक्षा एवं लाचार जीवों की रक्षा के केंद्र के रूप में बहुचर्चित महर्षि कुंभज की तपोभूमि अब खंडहर में तब्दील हो गयी है.
जिला मुख्यालय से लगभग 25 किमी उत्तर जलालपुर प्रखंड के पश्चिम मानसर कुमना अवस्थित कबीर पंथी मठ अब वर्तमान में अपनी पहचान खो चुका है. एक जमाने में कबीरपंथी संत नारायण गोस्वामी को बेतिया राजघराने द्वारा मठ के निर्माण के लिए साढ़े छह सौ एकड़ जमीन दान स्वरूप दी गयी थी,
लेकिन प्रशासनिक उदासीनता के कारण अब इस मठ की जमीन पर अतिक्रमण हो चुका है. इस कारण मठ का अस्तित्व ही खतरे में पड़ा हुआ है.
धार्मिक शिक्षा एवं लाचारों के लिए समर्पित था यह केंद्र : संत कबीर के शिष्य नारायण गोस्वामी व उनके बाद के उनके शिष्यों द्वारा इस मठ में आनेवाले संतों को अल्प समय के लिए बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के साथ-साथ समाज सुधार एवं धर्म के वास्तविक अर्थ को आम जनों को प्रसारित प्रचारित करने के लिए हर संभव प्रयास किया जाता था.
वहीं, लाचार संत की कौन कहे, गायों को आश्रय देने के लिए मठ के अंदर गौ लक्षणी आदि की व्यवस्था की गयी थी. इतना ही नहीं, इस मठ परिसर में पूर्व में संस्कृत शिक्षा का अलख जगाने के उद्देश्य से सर्वप्रथम शारदा संस्कृत उच्च विद्यालय की स्थापना की गयी थी.
वहां योग्य गुरु द्वारा एमए तक की शिक्षा-दीक्षा का कार्य किया जाता था, जो कि मठ के साथ-साथ खंडहर में विलुप्त हो गया.
55 एकड़ में थी चहारदीवारी : लगभग चार सौ वर्ष पूर्व प्रारंभ में इस मठ की 55 एकड़ में चहारदीवारी का निर्माण कबीर के शिष्य नारायण गोस्वामी तथा उनके परम प्रिय महंत मेथी भगत द्वारा कराया गया था. मठ के भवनों के निर्माण एवं प्राचीन समय में निर्माण की कला भी देखने को मिलती है.
हालांकि मठ परिसर में हथिसारगौ लक्षणी, सात कुएं, तालाब एवं मवेशियों के रहने एवं खाने-पीने की व्यवस्था अब देखने को नहीं मिलती. यहां तक कि दीवार में लगी ईंट भी लुप्त हो गयी है.
विभिन्न कबीर पंथी संतों का है समाधि स्थल : जलालपुर प्रखंड के मानसर कुमना गांव स्थित इस प्राचीन मठ में कबीर संतों नारायण गोस्वामी, जगदेव गोस्वामी, महंत मेथी भगत, विश्वनाथ भगत, विश्वामित्र भगत, महंत राम प्रवेश भगत का समाधि स्थल है, जो आज मठ परिसर में जंगलों में लुप्त हो चुके हैं.
मठ की जमीन पर दर्जनों लोगों ने किया अतिक्रमण : सरकार के द्वारा इस मठ की 26.96 डिसमिल जमीन मानसर कुमना मठ को देने के बाद शेष जमीन का परचा भूमिहीन किसानों को 1976 में खेत को जोतने के लिए दिया हुआ था.
लेकिन अब तक वास्तविक परचाधारियों को जमीन पर कब्जा नहीं मिला और प्रशासनिक उदासीनता के कारण दबंग लोगों द्वारा अवैध कब्जा कर जमीन की जम कर खरीद-फरोख्त की जाती है. वहीं, प्रशासन के कानों में जूं तक नहीं रेंग रहा है.
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