62 की जगह 19 डॉक्टर हैं पदस्थापित
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :14 Jun 2016 4:58 AM (IST)
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सदर अस्पताल. डॉक्टरों की कमी से अक्सर रेफर हो जाते हैं तीन जिलों के मरीज कम कर्मी व संसाधन की वजह से सहरसा सदर अस्पताल में रोगियों को मुकम्मल सुविधा नहीं मिल पाती है. कम डॉक्टर होने की वजह से गंभीर मरीजों को रेफर कर दिया जाता है. जो इलाज कराते भी हैं, उन्हें दवा […]
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सदर अस्पताल. डॉक्टरों की कमी से अक्सर रेफर हो जाते हैं तीन जिलों के मरीज
कम कर्मी व संसाधन की वजह से सहरसा सदर अस्पताल में रोगियों को मुकम्मल सुविधा नहीं मिल पाती है. कम डॉक्टर होने की वजह से गंभीर मरीजों को रेफर कर दिया जाता है. जो इलाज कराते भी हैं, उन्हें दवा मयस्सर नहीं हो पाती है. ऐसे में स्वास्थ्य विभाग को इस महत्वपूर्ण अस्पताल की सुधि लेने की आवश्यकता है.
सहरसा सिटी : स्वास्थ्य विभाग को लेकर भले ही सरकार व अधिकारी लाख दावा कर ले, लेकिन हकीकत कुछ और ही है. कोसी का प्रमंडलीय अस्पताल सदर अस्पताल, सहरसा में चिकित्सक से लेकर कर्मियों तक की घोर कमी है. मरीजों को मिलने वाली दवाओं में आधी से अधिक नहीं है. लोगों को जांच से लेकर दवा तक के लिये बाहर की दुकानों पर निर्भर रहना पड़ता है. मालूम हो कि सदर अस्पताल में सहरसा के अलावा मधेपुरा,
सुपौल, खगड़िया सहित अन्य जिलों के मरीज बेहतर इलाज के लिए आते है. लेकिन यहां आने के बाद वह अपने आप को ठगा महसूस करते है. क्योंकि यहां से उन्हें आगे रेफर कर ही दिया जाता है. उपलब्ध संसाधन के अनुसार मरीजों का इलाज भी बेहतर होता है. लेकिन सुविधा के अभाव में अस्पताल दिनों दिन बीमार पड़ता चला जा रहा है.
मधेपुरा, सुपौल व नेपाल से भी आते हैं रोगी
जांच के नाम पर हो रही खानापूर्ति
अस्पताल में ओपीडी की ऊपरी मंजिल पर संचालित जांच घर में ब्लड सुगर, ब्लड यूरिया, सीरियम बिलेरियम, क्रिटेमिन, कॉलस्ट्रोल सहित अन्य जांच कई महीनों से बंद है. मरीज निजी जांच घरों से जांच करवा कर अपना इलाज करवा रहे हैं. विभाग के कर्मियों ने बताया कि जांच किट उपलब्ध नहीं है. प्रमंडलीय अस्पताल होने की वजह से सदर अस्पताल स्थित जांच घर को उपकरणों की भी आवश्यकता है. अस्पताल के जांच घर में अभी सिर्फ दो सेमी ऑटोलाइजर ही लगा हुआ है. वहीं सोडियम पोटाशियम जांच के लिए फ्लैम फोटो मीटर लगाने की जरूरत है. इसके अलावा लैब को पूर्णत: एयरकंडीशन प्रूफ करने की भी आवश्यकता है.
नशा मुक्ति वार्ड में होता है बर्न का इलाज
सदर अस्पताल में एक अदद बर्न वार्ड भी नहीं है. जले हुए मरीज को अन्य मरीजों के साथ ही वार्डों में रखा जाता है. जबकि चिकित्सकों के अनुसार, जले हुए मरीजों को सबसे ज्यादा खतरा इंफेक्शन से ही रहता है. मिली जानकारी के अनुसार कुछ दिन पूर्व निरीक्षण के दौरान डीएम की नजर वार्ड में भरती तीन जले मरीजों पर पड़ी तो उन्होंने बर्न वार्ड की जानकारी ली. वार्ड नहीं रहने की जानकारी मिलने पर उन्होंने वहां भरती मरीजों को नशा मुक्ति केंद्र में बेड उपलब्ध कराने का निर्देश दिया. जिसके बाद तीनों मरीजों को केंद्र में भरती किया गया.
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