जनवरी की उम्मीद वाली धूप

Published at :02 Jan 2016 6:37 PM (IST)
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जनवरी की उम्मीद वाली धूप

जनवरी की उम्मीद वाली धूप गिरीन्द्र नाथ झादेखिए फिर एक नया साल आ गया और हम-आप इसके साथ कदम ताल करने लगे. शायद यही है जिंदगी, जहां हम उम्मीद वाली धूप में चहकने की ख्वाहिश पाले रखते हैं. उधर, उम्मीदों के धूप-छावं के बीच मेरा मन सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट पर उम्मीद के लिए लिखे जानेवाले […]

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जनवरी की उम्मीद वाली धूप गिरीन्द्र नाथ झादेखिए फिर एक नया साल आ गया और हम-आप इसके साथ कदम ताल करने लगे. शायद यही है जिंदगी, जहां हम उम्मीद वाली धूप में चहकने की ख्वाहिश पाले रखते हैं. उधर, उम्मीदों के धूप-छावं के बीच मेरा मन सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट पर उम्मीद के लिए लिखे जानेवाले शब्दों को देखने-पढ़ने में जुटा है, दोस्तों के फेसबुक स्टेटस को पढ़ रहा हूं और ट्विटर के दोस्तों की 140 शब्दों की कथाओं के तार को समझने की कोशिश कर रहा हूं.पीछे मुड़कर देखें तो पहले नये साल में हम डाकिये का इंतजार करते थे. डाकिया के जरिये दोस्त-संबंधियों के हाथों लिखे कार्ड का इंतजार हम करते थे और खुद भी उन्हें भेजते थे. लेखन की तब आदत थी. यह बात ज्यादा पुरानी नहीं है. दस साल पहले तक लोगबाग एक दुसरे को कार्ड आदि भेजते थे लेकिन आभासी दुनिया ने इस परंपरा को लगभग खत्म कर दिया है. फेसबुक-एसएमएस या फिर व्हाट्सऐप के जमाने में भला कौन कार्ड भेजेगा, किसे अब छुट्टी है.हालांकि आभासी दुनिया में लोगों के फेसबुक स्टेटस की भाषा और शैली भी काफी सुंदर होती है. इन्हें पढ़ते हुए लगता है कि जीवन में कितना कुछ सीखना अभी बांकी है. लोगबाग अपने अनुभवों को यहां उड़ेल रहे हैं तो कोई तस्वीरों और शुभकामना संदेशों के जरिए लोगों से जुड़ रहा है.इन संदेशों को पढ़कर लगता है कि आभासी दुनिया में लोगबाग कितना कुछ नया कर रहे हैं. नये साल में उम्मीद जग जाती है. दरअसल हम उम्मीद कहीं भी देख लेते हैं, खाली कमरों में भी और सोशल नेटवर्क में भी, जहां विचारों का अविरल प्रवाह हो रहा हो या फिर गाम की नहर, जिसमें बलूहाई पानी बह रही हो.2016 में हम सभी को काफी कुछ नया करना है. उस खाली डब्बे को भरना है, जिसे देखकर अब तक सब लोग हंस रहे थे. शहर में रहने वालों को भी अपना डब्बा भरना है और गांव के मेहनतकश किसानों को भी यही करना है.नये साल में सब कुछ नया करने का मतलब यह नहीं होता कि आप पिछले साल की बातों को भूल जाएं. होना यह चाहिए कि बीते साल की गलतियों पर गंभीरतापूर्वक विचार करें और उन से सबक लें. उन गलत फैसलों की समीक्षा करें जिन की वजह से आप को नीचा देखना पड़ा या असफलता का सामना करना पड़ा और निश्चय करें कि अब वैसी गलती आप दोबारा नहीं करेंगे. इस साल यह वादा खुद से जरूर करें कि आप अपनी गलतियों को दूसरों के सिर नहीं मढ़ेंगे क्योंकि आप की यह आदत आप की मदद करने के बजाय आप को कमजोर बनाती है. अपनी गलतियों की जिम्मेदारी लेने में घबराना नहीं चाहिए.हम सभी को खाली डब्बे में अपने तमाम सपनों और हसरतों को संजोकर रखना है. नये साल में फेसबुक स्टेट्स खंगालते हुए लगा की नये साल की शुभकामनाओं पर अभी काफी काम करना है. केवल हैप्पी न्यू ईयर कहने से काम नहीं चलेगा, हैप्पी होना भी होगा. नकारात्मक विचारों को छोड़कर सकारात्मक विचारों को अपनाना होगा. नयी पीढ़ी से संवाद करना होगा. हर किसी से कुछ न कुछ सीखना होगा तब जाकर ही बात बनेगी.नये साल पर मोबाइल फोन पर एक साथ भेजे गये संदेश, ईमेल और फेसबुक पर अन्य हजारों के साथ आये शुभकामना संदेशों में अपनेपन की गरमाहट महसूस तो हो रही है लेकिन इसे बनाये रखना भी होगा जो हर किसी के लिए एक बड़ी चुनौती होगी.सच पूछिए तो 2016 या किसी भी नये साल में हम जिस जोश में शुभकामना संदेशों का आदान-प्रदान करते हैं, उसे यदि हम साल के कुल जमा 12 महीने बनाये रखें तो किसी को कोई दिक्कत ही नहीं होगी. सब खुश रहेंगे एक दूसरे से.आप इसे मेरा भरम मान सकते हैं लेकिन किसानी करते हुए अब भरम से परे दुनिया को देखने की ख्वाहिशों को पालने की इच्छा बढ़ने लगी है.खैर, 2016 में आप उम्मीदों के धूप सेकते रहिए, खाली डब्बे को भरते रहिये साथ ही ईमान को बचाये रखिए. आलू और मक्का की खेती करते हुए मैं मुखौटा उतारना अब जान गया हूं. सच पूछिए तो अब शहरी मुखौटा उतार चुका हूं. मैं अब रेणु की ही वाणी में चिल्ला कर कह सकता हूं – नये साल में ‘मुखौटा’ उतारकर ताजा हवा फेफड़ों में भरें… और हां, ईमान जरूर बचाए रखें.(लेखक किसान और ब्लॉगर हैं. हाल ही में राजकमल प्रकाशन से इनकी किताब आई है – इश्क में माटी सोना)

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