पूर्व में परचा फेंक दी थी पीएलएफआइ ने आहट

पूर्व में परचा फेंक दी थी पीएलएफआइ ने आहट एएसपी के नेतृत्व में चौक-चौराहों की ली गयी थी तलाशीसदर थानाध्यक्ष के नेतृत्व में पुलिस ने किया था शहर में मार्च प्रतिनिधि, सहरसा सिटीजिला मुख्यालय में बीते 24 सितंबर को पहली बार पीपुल्स लिब्रेशन फ्रण्ट ऑफ इंडिया (पीएलएफआई) का धमकी भरा परचा मिलने के बाद सनसनी […]
पूर्व में परचा फेंक दी थी पीएलएफआइ ने आहट एएसपी के नेतृत्व में चौक-चौराहों की ली गयी थी तलाशीसदर थानाध्यक्ष के नेतृत्व में पुलिस ने किया था शहर में मार्च प्रतिनिधि, सहरसा सिटीजिला मुख्यालय में बीते 24 सितंबर को पहली बार पीपुल्स लिब्रेशन फ्रण्ट ऑफ इंडिया (पीएलएफआई) का धमकी भरा परचा मिलने के बाद सनसनी फैल गयी थी. पुलिस प्रशासन अलर्ट हो गया था. मालूम हो कि खुफिया विभाग के अधिकारियों को जानकारी मिली थी कि शहर के कई सार्वजनिक जगहों पर एक धमकी भरा परचा फेंका गया है. सूचना पर खुफिया विभाग ने तहकीकात शुरू की तो शहर के थाना चौक, गंगजला चौक, नगरपालिका चौक, पंचवटी चौक, बस स्टैंड के समीप कई परचा बरामद हुआ था. जिसके बाद खुफिया विभाग के अधिकारियों ने इसकी सूचना वरीय अधिकारियों को दी गयी थी. एसपी के निर्देश पर एएसपी मृत्युंजय कुमार चौधरी व सदर थानाध्यक्ष संजय कुमार सिंह ने कई चौक-चौराहों पर तलाशी ली. तलाशी के दौरान सदर अंचल पुलिस निरीक्षक के आवास के बगल से भी कई परचा बरामद किया गया था. –देशवासियों के नाम था परचा पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ऑफ इंडिया के बिहार सुप्रीमो गणेश शंकर के देशवासियों के नाम जारी परचा के शहर में मिलने के बाद खलबली मच गयी थी. परचा में कहा गया था कि हमारे पूर्वज स्वतंत्रता सेनानियों ने आजादी के रूप में जो स्वप्न देखा था, क्या 68 वर्षों के शासनकाल में दो से चार प्रतिशत भी साकार हो पाया है. मैं दावे के साथ कहता हूं कि नहीं हुआ. अंग्रेजी शासनकाल से बदतर स्थिति है. दीन हीन उन गरीबों का जो पूर्णत: असहाय हैं. खानाबदोश जीवन जीने वाले लोग जहां कहीं भी सिरकी तानकर सो जाते हैं. मजदूरों में अशिक्षा इस प्रकार हावी है कि वे मजदूरी के पैसे से शराब पी जाते हैं. 20 प्रतिशत पैसे वाले लोग इन मजदूरों को 300-400 रुपये देकर भी ताने मारते हैं, जबकि ये नित्य दिन हजारों कमाते हैं. सबसे बुरी हालात किसानों की है जो खेतों में फसल व मिलों में कपड़ा बनाकर भी भूखा और नंगा हैं. किसान-मजदूर और फुटपाथी लोगों की पढ़ाई के लिए निम्नस्तरीय खिचड़ी परोस विद्यालय है, जो केवल साक्षर बनाकर शोषण करने की फैक्ट्री मात्र हैं. पैसे वाले पूंजीपति व उद्योगपति एक रुपये के बराबर भी कार्य नहीं करते हैं तब भी इनके घरों में भोजन के एक से एक पकवान व व्यंजन पड़े हैं. सारे कीमती होटलों में ऐश-मौज के सारे सरजाम इकट्ठा है. इनके बच्चों के लिए लाखों रुपये फीस वाले एक से एक विद्यालय हैं तथा इनके इलाज के लिए इतने सुंदर व व्यवस्थित अस्पताल हैं, जिसे गरीबों ने देखा तक नहीं है. मैं पूछता हूं क्या यही आजादी है. पूर्ण समानतावादी आजादी की लड़ाई आवश्यक है. जिसमें सबों को समान अधिकार मिल सके. इसके लिए उन 20 प्रतिशत दुष्टोें को जिनके पास शेष पूरी आबादी के बराबर धन जमा है और जो पैसे के बल पर सदैव चुनाव जीतते हैं उन्हें घसीट-घसीट और दौड़ा-दौड़ा कर जान मार देने की जरूरत है. हमारा खून चूसकर धन संग्रह करने वाले इन लोगों का खून बहाकर अपने हक और अधिकार की लड़ाई लड़ने में बुराई भी क्या है. गरीबों जागो उठो और इनलोगों को जहां भी देखा इनका नरसंहार कर दो ताकि पूर्ण समानतावादी स्वतंत्रता की प्राप्ति की ओर बढ़ सकें और प्राप्त भी करें. इसके बाद एक कविता लिख लोगों को उकसाने का प्रयास किया गया था. परचा मिलने के बाद शहर में विधि व्यवस्था बनाये रखने के लिए सदर थानाध्यक्ष के नेतृत्व में सीआइएसएफ जवानों द्वारा फ्लैग मार्च निकाला गया था. फोटो -परचा 5- फेंका गया था यही परचा
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