काग बाबा ने पारिवारिक आश्रम को बदला संन्यास आश्रम में

Published at :01 Jan 2016 6:37 PM (IST)
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काग बाबा ने पारिवारिक आश्रम को बदला संन्यास आश्रम में

काग बाबा ने पारिवारिक आश्रम को बदला संन्यास आश्रम में 80वीं जयंती पर शिष्य स्वामी गुरुवानंद ने जीवन दर्शन पर किया प्रवचनकहा, काग बाबा का जीवन प्रेरक ही नहीं, अनुकरणीय भीसहरसा मुख्यालयसद्गुरु संत सत्यानंद काग बाबा की जयंती समारोह पर उनके आशीर्वाद प्राप्त शिष्य गुरुवानंद बाबा ने काग बाबा के जीवन दर्शन पर प्रकाश डाला. […]

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काग बाबा ने पारिवारिक आश्रम को बदला संन्यास आश्रम में 80वीं जयंती पर शिष्य स्वामी गुरुवानंद ने जीवन दर्शन पर किया प्रवचनकहा, काग बाबा का जीवन प्रेरक ही नहीं, अनुकरणीय भीसहरसा मुख्यालयसद्गुरु संत सत्यानंद काग बाबा की जयंती समारोह पर उनके आशीर्वाद प्राप्त शिष्य गुरुवानंद बाबा ने काग बाबा के जीवन दर्शन पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि पहली जनवरी 1936 को जिले के गोलमा गांव में पिता तुरंती साहू एवं माता कामेश्वरी देवी के घर अवतरित हुए काग बाबा का जीवन सबों के लिए प्रेरक ही नहीं, बल्कि अनुकरणीय भी है. उन्होंने कहा कि बाबा का कर्मक्षेत्र मधेपुरा के साहूगढ़ स्थित जानकी टोला उनका ननिहाल रहा. लेकिन उनका संदेश व प्रभाव संपूर्ण बिहार में फैलता रहा. मैट्रिक उतीर्ण करने के बाद काग बाब मधेपुरा जिला सहायक निबंधक कार्यालय में लिपिक के पद पर नियुक्त और 1995 में प्रधान लिपिक के पद से सेवानिवृत हुए. किशोरावस्था से ही बाबा योग, मनन व ध्यान की ओर आकर्षित हुए. पारिवारिक आश्रम को संन्यास आश्रम में बदल योग साधना में पराकाष्ठा को प्राप्त किया. उपदेश सुनने आते थे तीन कौवेकुछ ही दिनों में उनकी साधना का प्रत्यक्ष प्रभाव दिखने लगा. जब 1979 के 27 सितंबर से तीन कौवे उनके गोद में आकर बैठने लगे. साधना एवं प्रवचन के दौरान ये कौवे लगातार उनका उपदेश सुनने आते रहे. गुरुवानंद बाबा ने कहा कि कागबाबा ने आत्मतत्व से अहं ब्रह्मास्मि के प्राप्त ज्ञान कर प्रभा से मानव मात्र के समस्त दुखों का सुगमता व सहजता से निवृति के लिए चतुष्पाद साधना (आत्मनिरीक्षण, आत्मसंयम, आत्मानुवेषण व आत्मदर्शन) का अन्वेषण किया. अपने ज्ञान के आधार पर काग बाबा ने एक परमात्मा व एक धर्म का संदेश दिया और बताया कि मूर्ति पूजा छोटी पूजा एवं ध्यान बड़ी पूजा मनुष्य के जीवन में सहायक होती है. उन्होंने कहा कि काग बाबा के अनुसार मानवीय धर्म से ही संप्रदायवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद, प्रांतवाद, राष्ट्रवाद, उंच-नीच, छोटे-बड़े की खाई को समाप्त किया जा सकता है और धरा पर रामराज्य का आगमन हो सकता है. काग बाबा के दर्शन के आलोक में स्वामी गुरुवानंद ने कहा कि बुढ़ापे में माता-पिता की सेवा ही सच्चा श्राद्ध है, न कि मृत्यु के बाद पिंडदान या भोज का आयोजन. मन की शुद्धता ही दुर्गा की पूजा है न कि दुर्गा के सामने किसी जीव की हत्या करना. फोटो- बाबा 32- काग बाबा की जयंती पर प्रवचन करते स्वामी गुरूवानंद

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