स्मार्ट सिटी के दौर में गांव की बातें

Published at :19 Dec 2015 6:37 PM (IST)
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स्मार्ट सिटी के दौर में गांव की बातें

स्मार्ट सिटी के दौर में गांव की बातेंगिरीन्द्र नाथ झाजब हर कोई स्मार्ट सिटी की बात करता है, स्मार्ट फोन से लैस रहता है और गांव से दूर होता जा रहा है उस वक्त मुझे आप लोगों से गांव की बातें करने का मन करता है. मुझे अक्सर लगता है कि गांव एक कथा है […]

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स्मार्ट सिटी के दौर में गांव की बातेंगिरीन्द्र नाथ झाजब हर कोई स्मार्ट सिटी की बात करता है, स्मार्ट फोन से लैस रहता है और गांव से दूर होता जा रहा है उस वक्त मुझे आप लोगों से गांव की बातें करने का मन करता है. मुझे अक्सर लगता है कि गांव एक कथा है तो कभी-कभी लगता है कि गांव-घर एक बहती नदी है जिसमें हर किसी को डुबकी लगानी चाहिए.बिहार के कई हिस्सों में भगैत गायन का अपना महत्व है. हाल ही में आॅस्ट्रेलिया से आये मेरे दोस्त इयान वुल्फोर्ड जब चनका गांव में भगैत सुनने बैठे तो वे भावुक हो गये. दरअसल अंचल में भगैत की उपस्थति ठीक वैसे ही है जैसे जीवन में प्रेम.भगैत के दौरान मूलगैन (मुख्य-गायक) का आलाप सबसे अधिक खींचता है. इस दौरान गांव के लोगों की आंखों को पढ़ना भी जरूरी लगा. लोकप्रिय संगीत-गीत के दौर में भगैत की उपस्थिति से आप टोले के मन को समझ सकते हैं. डीजे की धुन पर नाचनेवाले इन नौजवानों के मन में अभी भी भगैत का स्थान सर्वोपरि है. इन लोगों की आंखों को देखकर मुझे कबीर की वाणी याद आ गयी- “अनुभव गावै सो गीता”भगैत के ठीक बाद कहीं-कहीं नाच का भी कार्यक्रम होता है. कोसी में कभी विदापत नाच हुआ करता था, जिसमें ढोलक की थाप और विकटा का पात्र इसी टोले का गबरु जवान हुआ करता था लेकिन वक्त के संग बहुत सारी चीजें बदलती है और इसी बदलाव की कड़ी में अंचल की सांस्कृतिक अध्याय में भी बदलाव दिखने लगा. लेकिन कुछ जगहों में विदापत नाच का कुछ अंश अभी भी जीवित है.विद्यापति के राधा-कृष्ण के शृंगारिक गीतों को प्रस्तुत किया जानेवाला यह विदापत नाच कोसी की पौराणिक परंपरा की मिशाल है. 1960 में आकाशवाणी पटना द्वारा इसकी रिकाॅर्डिंग के लिए एक मंडली की स्थापना की गयी थी, जिसके लिए कथाशिल्पी फणीश्वर नाथ रेणु ने पहल की थी.अब देखिए न, ये सब लिखते हुए ठिठर मंडल की याद आने लगी है. लोगबाग कहते हैं कि कोसी के इलाकों में विदापत नाच में हमेशा से कृष्ण की भूमिका निभानेवाले ठिठर का जलवा मंच पर देखते ही बनता था. 75 वर्ष की उम्र में भी मंच पर कृष्ण की भूमिका में उतर कर वे बांसुरी बजाते थे. अफसोस साल 2010 के फरवरी में ठिठर ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.हाल ही अपने गांव में विदापत नाच देखने को मिला. हालांकि यह आधे घंटे ही चला लेकिन इस दौरान ढोल-मृदंग-झाल की आवाजें स्मार्ट होते हुए हमारे मन को गांव से करीब लाने का काम करती है.एक ओर जहां विदापत नाच का संगीत मन को खींच रहा था उसी पल 2006 के दिसंबर में दिल्ली के नेहरू पार्क में स्पीक मैके के सौजन्य से आयोजित एक कार्यक्रम में शुभा मुदगल जी के एक कार्यक्रम की याद आ गयी. उस सर्द शाम शुभा जी ने हमलोगों को सूफी संगीत में बांध रखा था. संगीत यही है, यह दूरी मिटा देती है.इस भागम भाग भरी जिंदगी में हम सभी को गांव की तरफ देखना चाहिए. वहां की बातें करनी चाहिए. स्मार्ट तो बन जायेंगे लेकिन अपनी जमीन भूल जाएं, वहां की लोक संस्कृति और गायन को भूल जाएं, यह ठीक नहीं है.खैर इन सबके संग गांव बना रहेगा, यह भरोसा है. गाम-घर की कथा भी चलती रहेगी, ठीक जीवन की तरह. कभी-कभी लगता है क्या कोई कथा सचमुच में संपूर्ण हो पाती है? यह सवाल मायावी है, ज्ञानी-विद्वत जन इस पर राय देंगे. फिलहाल गाम से बातों ही बातों में इतना ही, यह कहते हुए कि “चल खुसरो घर आपने रैन भई चहुं देस…”

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