पेपर मिल को लगी किसकी नजर

Published at :21 Apr 2015 2:13 PM (IST)
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पेपर मिल को लगी किसकी नजर

सहरसा : कोसी क्षेत्र के उद्योग जगत का एकमात्र (धूमिल हो रहा) सितारा बैजनाथपुर पेपर मिल अपनी स्थापना के 37 वर्ष बाद भी आज तक चालू नहीं हो पाया है. मशीनें जंग खाकर बरबाद हो रही है. अब तो स्थानीय लोगों सहित मिल के कर्मियों को लगता है कि सूबे की वतर्मान सरकार भी पेपर […]

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सहरसा : कोसी क्षेत्र के उद्योग जगत का एकमात्र (धूमिल हो रहा) सितारा बैजनाथपुर पेपर मिल अपनी स्थापना के 37 वर्ष बाद भी आज तक चालू नहीं हो पाया है. मशीनें जंग खाकर बरबाद हो रही है. अब तो स्थानीय लोगों सहित मिल के कर्मियों को लगता है कि सूबे की वतर्मान सरकार भी पेपर मिल को शुरू कराने में अक्षम ही साबित हो रही है. बार-बार दिये जाने वाले झूठे होते आये आश्वासन व स्थापना के बाद का लंबा अंतराल लोगों में इसके प्रति निराशा पैदा कर चुका है. सुशासन सरकार के बीते आठ वर्ष भी इसके लिए कोई आशा जनक परिणाम नहीं ला सके, जबकि बिहार में नये उद्योगों को स्थापित करने की प्रक्रिया जोरों से चल रही है. पूर्व स्थापित उद्योग की तरफ थोड़ा भी ध्यान दिया जाता तो इसका कायापलट हो सकता था. चुनाव या किसी नेता या मंत्री की हरेक आवक पर इसकी चर्चा अवश्य होती है. लेकिन आश्वासन के अलावा कुछ हासिल नहीं होता.

1975 में हुई थी स्थापना

कोसी के विकास और युवाओं को रोजगार को साथ लेकर चलने के लिए जिला मुख्यालय से पांच किलोमीटर दूर बैजनाथपुर में पेपर मिल स्थापना करने की सरकारी कवायद वर्ष 1975 में शुरू हुई थी. 48 एकड़ भूमि अधिग्रहण करके बिहार सरकार ने इसे चलाने के लिए निजी और सरकारी सहयोग के उद्देश्य से बिहार पेपर मिल्स लिमिटेड कंपनी का गठन किया. जिसने निर्माण कार्य शुरू करवाया. 1978 में निजी उद्यमियों से करार खत्म होने के कारण काम रूक गया. तत्कालीन सरकार ने पब्लिक क्षेत्र के अंतर्गत परियोजना को चलाने का निर्णय लिया. जिसके बाद बैजनाथपुर पेपर मिल बिहार राज्य औद्योगिक विकास निगम की पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी हो गयी. उस दिन से कंपनी के शत प्रतिशत शेयर की हकदार भी निगम हो गयी. बिहार सरकार और निगम की आपसी सहमति के बाद विदेश से एक पुरानी मशीन भी खरीदी गयी. भारत सरकार के प्रतिष्ठान हिंदुस्तान स्टील कंस्ट्रक्शन लिमिटेड को मिल में होने वाले असैनिक कार्यो की जिम्मेवारी दी गयी. 1987 में निगम द्वारा कार्य स्थल में दो वर्षों का लक्ष्य निर्धारित कर कार्य शुरू किया गया. लेकिन निगम और सरकार द्वारा सही समय पर राशि का आवंटन नहीं होने के कारण निर्माण कार्य की गति धीमी होती गयी. अंतत: सरकारी उदासीनता और बैंकों के असहयोग के कारण परियोजना कार्य बंद होता चला गया. 1996-97 में बैंक ऑफ इंडिया द्वारा स्वीकृत कर्ज 7 करोड 40 लाख विमुक्त करने के बाद मिल का कार्य फिर से शुरू किया गया. इतनी राशि से मिल का 80 प्रतिशत कार्य ही पूर्ण हो पाया.

दस करोड़ बतायी थी चालू होने की कीमत

वर्ष 2012 में तत्कालीन उद्योग मंत्री रेणु कुशवाहा के पेपर मिल के निरीक्षण के दौरान बताया गया था कि वर्तमान समय में लगभग दस करोड़ रुपये की वर्किंग कैपिटल से कारखाना चालू हो सकता है. अब तक जो निवेश किये जा चुके हैं उनमें निगम द्वारा 7 करोड़ 78 लाख और बैंक द्वारा 6 करोड़ 72 लाख की राशि शामिल है. जबकि अभी मिल को निर्माण क्षेत्र में लगभग 6 करोड़ और वर्किग क्षेत्र में लगभग 4 करोड़ 67 लाख रुपये की आवश्यकता होगी. हालांकि राज्य सरकार की उद्योग मंत्री रेणु कुशवाहा ने भी साल 2013 में ही मिल के चालू की घोषणा भी कर दी थी.

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