सीएम की घोषणा के बाद अब काझा कोठी को बहुत जल्द मिलेगा ‘मिथिला हाट’ का लुक

Published at :28 Jan 2025 6:31 PM (IST)
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अंग्रेजिया राज का गवाह रहा है काझा कोठी

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अंग्रेजिया राज का गवाह रहा है काझा कोठी, यहां से करते थे नील खेती की निगरानी

पर्यटन स्थल के रुप में विकसित करने के लिए कई सालों से प्रयासरत रहीं मंत्री लेशी सिंह

ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित और विकसित करने में जिला प्रशासन की रही अहम भूमिका

पूर्णिया. जिला मुख्यालय से महज 12 किलोमीटर दूर काझा गांव स्थित अंग्रेजिया राज का गवाह रहा काझा कोठी को अब बहुत जल्द ‘मिथिला हाट’ का लुक मिलेगा. प्रगति यात्रा के तहत पूर्णिया आए मुख्यमंत्री की घोषणा के साथ ही पूर्णियावासियों की इस उम्मीद को संबल मिला है. इसी के साथ काझा कोठी को बड़े पर्यटन स्थल के रुप में विकसित करने के लिए विगत कई वर्षों से जुटीं खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री लेशी सिंह के प्रयासों को भी मुकाम मिलेगा. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मंगलवार को इसकी विधिवत घोषणा की. इसको पर्यटन विभाग द्वारा ‘मिथिला हाट’ की तरह विकसित किया जाना है जबकि स्टेट हाइवे 65 से सीधा संपर्क सड़क का काम पथ निर्माण विभाग को करना है. इस ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित और विकसित करने के लिए जिला प्रशासन की भी अहम भूमिका रही है. यह एक आइकॉनिक प्रोजेक्ट है जिसमें 10 स्थाई और 10 पोर्टेबल स्टॉल बनाए जाएंगे जिनका उपयोग फूड और क्राफ्ट स्टॉल्स के रूप में किया जाएगा. अहम यह है कि इसमें स्थानीय कौशल और क्राफ्ट को बढ़ावा दिया जाएगा. पर्यटकों के लिए आकर्षक बनाने के लिए यहां 1807 वर्ग फुट का डाइनिंग एरिया बनाया जाना है जबकि काझा कोठी के तालाब में पैडल बोटिंग की व्यवस्था की जाएगी जहां लोग नौका विहार का आनंद ले पाएंगे. तालाब में एरेटेड फाउंटेन, म्युजिकल फाउंटेन और लाइट एंड साउंड शो की व्यवस्था भी की जाएगी. इसके अलावा, एग्जिबिशन गैलरी, वर्मा ब्रिज, एमटीवी, हैंगिंग जंगल ब्रिज, सेल्फी प्वाइंट्स, कैनोपी वॉक और अन्य मनोरंजन की सुविधाएं यहां आकर्षण का केंद्र होगा.

काझा कोठी का इतिहास

आज हम जिसे काझा कोठी कहते हैं, अंग्रेजों के जमाने में इसे ”नील कोठी” कहा जाता था. काझा कोठी ब्रिटिश साम्राज्य में बनायी गयी थी जहां एक पार्क भी है. कहते हैं मैक्स इलटे नामक एक अंग्रेज अफसर ने सन् 1769 में नील की खेती शुरू करवाई थी और उसी पर नजर रखने के लिए सन् 1775 में इस काझा कोठी का भी निर्माण करवाया गया था. यहीं रहकर अंग्रेज गांव वालों को नील की खेती का प्रशिक्षण दिया करते थे. अस्सी के दशक में तत्कालीन डीएम रामसेवक शर्मा ने इसे सर्किट हाउस के रुप में विकसित किया था.उस समय यहां जूट से काश्तकारी को बढ़ावा दिया गया था.

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