LPG संकट ने छीनी बिहार के मजदूरों की रोजी-रोटी, ट्रेनों में धक्के खाकर लौट रहे घर

स्टेशन पर बैठे यात्री
LPG Crisis: मिडिल ईस्ट संकट के चलते एलपीजी की किल्लत ने देशभर में कामकाज पर असर डाला है. दिल्ली, मुंबई समेत कई शहरों से हजारों बिहारी मजदूर रोजगार छिनने के बाद मजबूर होकर अपने गांव लौट रहे हैं.
LPG Crisis: ईरान और मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध का असर अब भारत के मजदूरों पर भी साफ दिखने लगा है. एलपीजी संकट के चलते दिल्ली, मुंबई, पुणे, हैदराबाद और पंजाब जैसे शहरों में काम करने वाले हजारों बिहारी प्रवासी मजदूरों की रोजी-रोटी छिन गई है. हालात ऐसे हो गए हैं कि बड़ी संख्या में मजदूर ट्रेनों से वापस अपने गांव लौट रहे हैं.
ट्रेनों में बढ़ी भीड़, हर कोई घर लौटने को मजबूर
दानापुर, गया और मुजफ्फरपुर जैसे स्टेशनों पर लौटने वाले मजदूरों की भारी भीड़ देखी जा रही है. पुणे-दानापुर स्पेशल, जनसाधारण एक्सप्रेस, अमृत भारत और लोकमान्य तिलक टर्मिनल-भागलपुर एक्सप्रेस जैसी ट्रेनों में लोग भर-भरकर लौट रहे हैं. हर किसी के चेहरे पर चिंता और भविष्य को लेकर अनिश्चितता साफ नजर आ रही है.
महंगी गैस और भूखे बच्चे बने मजबूरी
पुणे से लौटे मजदूरों ने बताया कि पहले जो गैस 50-60 रुपये किलो मिलती थी, वह अचानक 300-400 रुपये किलो तक पहुंच गई. कई दिनों तक लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाया, लेकिन जब लकड़ी भी मिलना बंद हो गया तो हालात और बिगड़ गए. बच्चों के लिए खाना जुटाना मुश्किल हो गया, इसलिए गांव लौटने का फैसला लेना पड़ा.
कंपनियों ने निकाला, मजदूरी भी अधूरी
कई मजदूरों ने आरोप लगाया कि फैक्ट्रियों ने उन्हें अचानक काम से निकाल दिया और पूरी मजदूरी भी नहीं दी. पुणे, हैदराबाद और दिल्ली में काम कर रहे श्रमिकों का कहना है कि गैस की किल्लत से उत्पादन ठप हो गया, जिससे कंपनियों ने कर्मचारियों को हटाना शुरू कर दिया.
दिल्ली में बंद हुए कारखाने
कई मजदूरों ने बताया कि दिल्ली के पंजाबी बाग में चल रहा उनका सैंडल बनाने का कारखाना भी बंद करना पड़ा. पहले ब्लैक में महंगी गैस लेकर काम चलाया, लेकिन बाद में गैस मिलना ही बंद हो गया. मजबूरी में सालों पुराना काम छोड़कर वापस गांव लौटना पड़ा.
होटल-ढाबे भी हुए बंद, बढ़ा संकट
गैस की कमी का असर सिर्फ घरों तक नहीं, बल्कि होटल और ढाबों पर भी पड़ा है. कई छोटे होटल बंद हो चुके हैं और जहां खुले हैं, वहां खाना काफी महंगा हो गया है. रोज कमाने-खाने वाले मजदूरों के लिए यह खर्च उठाना मुश्किल हो गया है.
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By Abhinandan Pandey
अभिनंदन पांडेय डिजिटल माध्यम में पिछले 2 सालों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. बंसल न्यूज (MP/CG) और दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अनुभव लेते हुए अब प्रभात खबर तक का मुकाम तय किए हैं. अभी डिजिटल बिहार टीम में काम कर रहे हैं. सामाजिक-राजनीतिक नब्ज को करीब से समझने का प्रयास करते हैं. देश-विदेश की घटनाओं, बिहार की राजनीति, और किस्से-कहानियों में विशेष रुचि रखते हैं. डिजिटल मीडिया के नए ट्रेंड्स, टूल्स और नैरेटिव स्टाइल्स के साथ प्रयोग करना पसंद है.
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