21.1 C
Ranchi

लेटेस्ट वीडियो

Dal Crisis In Bihar: दाल से वंचित बिहार, ‘दाल का कटोरा’ सूना क्यों पड़ गया?

Dal Crisis In Bihar:रसोई की थाली से दाल और तेल की कमी सिर्फ घर की समस्या नहीं है, यह पूरे बिहार की कृषि व्यवस्था और नीति-निर्धारण पर बड़ा सवाल है. जिस राज्य को कभी ‘दाल का कटोरा’ कहा जाता था, आज वहां प्रति व्यक्ति दाल का उत्पादन तीन ग्राम और तेलहन का मात्र दस ग्राम रह गया है.

Dal Crisis In Bihar: कभी जिसे ‘दाल का कटोरा’ कहा जाता था, वही बिहार आज दाल और तेल के लिए तरस रहा है. हालत यह है कि प्रति व्यक्ति दाल का उत्पादन तीन ग्राम और तेलहन का महज दस ग्राम रह गया है.

थाली से गायब होती दाल सिर्फ महंगाई की वजह नहीं है, यह खेती, नीतियों और मोकामा टाल जैसे इलाकों की उपेक्षा की कहानी भी कहती है. सवाल साफ है—बिहार की थाली सूनी क्यों पड़ रही है?

उत्पादन और मांग के बीच चौड़ी खाई

कृषि विभाग की ताजा रिपोर्ट ने बिहार की हकीकत सामने रख दी है. राज्य को हर साल लगभग 11.92 लाख मीट्रिक टन दाल की जरूरत होती है, लेकिन 2023-24 में इसका उत्पादन घटकर महज 3.98 लाख टन रह गया. यानी लगभग आठ लाख टन की सीधी कमी. इसी तरह तेलहन का हाल और भी खराब है. राज्य को 14.31 लाख टन तेलहन की आवश्यकता है, लेकिन उत्पादन सिर्फ 1.5 लाख टन हुआ. मांग और आपूर्ति के बीच यह भारी अंतर सीधे आम जनता की थाली पर असर डाल रहा है.

IGMR के मुताबिक, प्रत्येक व्यक्ति को रोजाना 25 ग्राम दाल और 30 ग्राम तेलहन की जरूरत है. मगर बिहार में यह जरूरत पूरी होने से बहुत दूर है. दाल की उपलब्धता मांग का केवल 33 फीसदी और तेलहन का तो मात्र 10 फीसदी ही है.

1963 में केएल राव ने टाल का प्रोजेक्ट बनाया था

दाल क्षेत्र के विकास को लेकर केंद्र एवं राज्य सरकार ने अपने इंजीनियर केएल राव को 1963 में इस क्षेत्र का दौरा कर प्रोजेक्ट बनाने की जिम्मेवारी सौंपी, लेकिन श्री राव के रिपोर्ट में अधिक राशि की लागत को देख कर उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. इसके बाद1969 एवं 70 में किसान रामनारायण सिंह के आमरण अनशन के बाद केंद्र सरकार ने दो वर्षो तक इस क्षेत्र को कीड़ाखोरी से बचाव को लेकर हवाई जहाज से कीटनाश का छिड़काव भी कराया.

1980 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ जगन्नाथ मिश्र ने बड़हिया टाल दियारा, हरूहर नदी के किनारे पचास से उपर की संख्या में लिफ्ट इरिगेशन का टावर बना कर मोटर पंप बैठा कर सिंचाई की सुविधा प्रदान की, लेकिन यह सरकार को शोभा बन कर रह गया.

खेती से मोहभंग, घटता उत्पादन

पिछले तीन वर्षों में राज्य का कुल खाद्यान्न उत्पादन सात लाख टन कम हुआ है. चावल की पैदावार थोड़ी बढ़ी है, लेकिन गेहूं, दाल और मक्का में गिरावट दर्ज की गई है. खेती का रकबा भी दो लाख हेक्टेयर घट चुका है.

गेहूं की तस्वीर बताती है कि 2021-22 में जहां उत्पादन 68.98 लाख टन था, वहीं अगले साल घटकर 66 लाख टन रह गया. 2023-24 में मामूली सुधार हुआ, लेकिन यह अब भी दो साल पहले के स्तर से कम है. मक्का का भी यही हाल है। 2021-22 में 34.71 लाख टन मक्का हुआ, अगले साल यह 48.29 लाख टन तक गया, लेकिन 2023-24 में धड़ाम होकर 33.78 लाख टन पर आ गया.

सबसे बुरा हाल दाल का है. दो साल पहले जहां उत्पादन 4.14 लाख टन तक पहुंचा था, वहीं बीते साल यह घटकर 2.85 लाख टन रह गया. इस गिरावट ने थाली से दाल गायब करने की आशंका और बढ़ा दी है.

संकट के कारण

Hee 63 860X484 1
Dal crisis in bihar: दाल से वंचित बिहार, ‘दाल का कटोरा’ सूना क्यों पड़ गया? 3


मोकामा दाल क्षेत्र गंगा नदी के पास स्थित है, जहां प्रत्येक साल बारिश के मौसम में आठ से दस फीट तक पानी जमा हो जाता है, और यह पानी बाद में गंगा नदी में समाहित हो जाता है. इस प्रक्रिया से क्षेत्र में जलजमाव की समस्या उत्पन्न होती है, जिससे किसानों के लिए खेतों में फसल उगाना कठिन हो जाता है. विशेषकर दलहनी फसलों की बुआई का समय, जो आमतौर पर 15 अक्टूबर से 15 नवंबर तक होता है, जलजमाव के कारण अटक जाता है. इससे बुआई समय पर नहीं हो पाती और हजारों एकड़ खेत परती रह जाते हैं.

बिहार विधानसभा में इस संकट पर चर्चा करते हुए तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष विजय सिन्हा ने राज्य सरकार से इस समस्या का समाधान जल्दी निकालने की अपील की थी, लेकिन हालात में कोई विशेष बदलाव नहीं आया है.

किसानों की पुकार और सरकारी वादे

विधानसभा में भी मोकामा टाल का मुद्दा कई बार उठा. 2021 में तत्कालीन अध्यक्ष विजय सिन्हा ने इस क्षेत्र को ‘दाल का कटोरा’ बताते हुए कहा था कि यहां के किसानों की स्थिति भुखमरी जैसी हो गई है. लेकिन किसानों का आरोप है कि सरकार ने बजट तो दिया, पर जमीन पर कोई ठोस काम नहीं दिखा.

थाली महंगी, थाली अधूरी

दाल और तेल के उत्पादन की यह स्थिति केवल किसानों की समस्या नहीं है. यह हर उस परिवार की समस्या है, जो हर दिन थाली में दाल-रोटी चाहता है.मांग और आपूर्ति की खाई बढ़ने से कीमतें बढ़ती हैं और गरीब परिवारों के लिए दाल-तेल दूर की चीज बन जाती है.

बिहार को अगर वाकई ‘दाल का कटोरा’ बनाए रखना है, तो मोकामा टाल जैसी समस्याओं का स्थायी समाधान जरूरी है. जल निकासी, बुनियादी ढांचा और किसानों के भरोसे को बहाल किए बिना न तो उत्पादन बढ़ेगा और न ही आम जनता की थाली भर पाएगी.

Also Read: Bihar News: सरकारी अस्पतालों में दवा बांटने में बिहार बना चैंपियन, लगातार 11वीं बार टॉप पर

Pratyush Prashant
Pratyush Prashant
कंटेंट एडिटर और तीन बार लाड़ली मीडिया अवॉर्ड विजेता. जेंडर और मीडिया विषय में पीएच.डी. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल की बिहार टीम में कार्यरत. डेवलपमेंट, ओरिजनल और राजनीतिक खबरों पर लेखन में विशेष रुचि. सामाजिक सरोकारों, मीडिया विमर्श और समकालीन राजनीति पर पैनी नजर. किताबें पढ़ना और वायलीन बजाना पसंद.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

संबंधित ख़बरें

Trending News

जरूर पढ़ें

वायरल खबरें

ऐप पर पढें
होम आप का शहर
News Snap News Reel