बचपन लौटा, अब किताबों संग भर रहे सपनों की उड़ान

Published by : MANISH LIFE Updated At : 11 Jun 2025 10:13 PM

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हर साल 12 जून को विश्व बाल श्रम निषेध दिवस मनाया जाता है. साल 2021 की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया भर में करीब 16 करोड़ बच्चे मजदूरी करने पर मजबूर हैं, जिनमें बड़ी संख्या भारत और खासकर बिहार के बच्चों की है. ये बच्चे जोखिम भरे हालात में 18-20 घंटे तक काम करते हैं, जिससे उनका बचपन, शिक्षा और भविष्य सब कुछ दांव पर लग जाता है. गया जिले के तीन बच्चों की कहानी भी ऐसी ही है. जयपुर की फैक्ट्रियों से रेस्क्यू होने के बाद आज वे पटना में पढ़ाई कर रहे हैं और एक बेहतर कल की ओर बढ़ रहे हैं.

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विश्व बाल श्रम निषेध दिवस. बाल मजदूरी से मुक्त होने के बाद पढ़ाई में तरक्की कर रहे गया के बच्चे लाइफ रिपोर्टर@पटना हर साल 12 जून को विश्व बाल श्रम निषेध दिवस मनाया जाता है – एक ऐसा दिन जो हमें याद दिलाता है कि बचपन खेलने-कूदने, सपने देखने और पढ़ने-लिखने का समय होता है, न कि बोझ उठाने का. लेकिन हकीकत आज भी चौंकाने वाली है. साल 2021 की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया भर में करीब 16 करोड़ बच्चे मजदूरी करने पर मजबूर हैं, जिनमें बड़ी संख्या भारत और खासकर बिहार के बच्चों की है. ये बच्चे जोखिम भरे हालात में 18-20 घंटे तक काम करते हैं, जिससे उनका बचपन, शिक्षा और भविष्य सब कुछ दांव पर लग जाता है. गया जिले के तीन बच्चों की कहानी भी ऐसी ही है. जयपुर की फैक्ट्रियों से रेस्क्यू होने के बाद आज वे पटना में पढ़ाई कर रहे हैं और एक बेहतर कल की ओर बढ़ रहे हैं. ……………. प्रतिदिन 18 से 20 घंटे कराया जाता था काम गया जिले के कुजाति गांव के रहने नीतीश कुमार की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी. दलालों ने उनके माता-पिता को पैसे देकर जयपुर ले गये. कहा गया कि सिर्फ दो घंटे काम और बाकी समय पढ़ाई होगी. लेकिन, वहां उन्हें चूड़ी बनाने वाली फैक्ट्री में 18-20 घंटे तक काम कराया गया. जब काम नहीं करते, तो मारा जाता था. नीतीश ने किसी तरह पुलिस से संपर्क किया. वहां से बचा कर उन्हें बिहार लाया गया, जिसके बाद सेंटर डायरेक्ट संस्था के सुरेश कुमार ने उनकी मदद की. अब पटना में रह कर पढ़ाई कर रहे हैं. इस साल 11वीं पास की और अगला लक्ष्य 12वीं बोर्ड है. दसवीं में उन्होंने 361 अंक प्राप्त किये. नीतीश इंडियन आर्मी में जाना चाहते हैं और समाज सेवा भी करना चाहते हैं. ……………. दो हजार रुपये में बिका आशीष का बचपन शेरघाटी के रहने वाले आशीष कुमार मांझी को साल 2014 में ट्रैफिकर पढ़ाई और पैसे का झांसा देकर जयपुर ले गया. उम्र थी 14 साल और घर की जिम्मेदारी भी थी, इसलिए पिता ने जाने दिया. बदले में परिवार को दो हजार रुपये मिले. फैक्ट्री में पुराने बच्चों से एक महीने की ट्रेनिंग दिलायी गयी. फिर सुबह 5 से रात 12 बजे तक काम करवाया गया. खाना भी ठीक से नहीं मिलता था. उन्होंने पांच-छह साल के बच्चों को भी काम करते देखा. एक दिन होटल में खाना खाने गये, तो पास के थाने में जाकर मदद मांगी. पुलिस ने छापा मारा और 46 बच्चों को बाल गृह भेजा गया. वहां मेडिकल जांच में फेफड़ों में धूल की शिकायत पायी गयी. अब आशीष मछली बेच कर घर चलाते हैं और पढ़ाई भी करते हैं. साल 2024 में 12वीं पास की है. ……………. पिता की मौत के बाद दलालों ने झांसे में लिया शिवपूजन कुमार बताते हैं कि जब वह पांचवीं कक्षा में थे, तभी बालश्रम का शिकार हुए. उनके पिता की उसी वक्त में मौत हुई थी. दलाल गांव में आया और उनके परिवार को झांसा दिया कि बेटे को पढ़ायेंगे. पहले दो दिन अपने घर में रखा, खाना खिलाया, प्यार दिखाया. फिर जयपुर ले जाकर फैक्ट्री में डाल दिया. वहां 18-20 घंटे काम कराया गया. समय पर खाना भी नहीं मिलता था. जब हालात और खराब हुए, तो एक साथी के साथ भागने की कोशिश की. इसी बीच पुलिस आ गयी. उन्हें अपनी कहानी बतायी. इसके बाद रेस्क्यू कर लिया गया. फिलहाल शिवपूजन पटना में रह कर पढ़ाई कर रहे हैं. उनका कहना है कि अगर सहयोग मिला, तो पढ़ाई जारी रखेंगे. वह चाहते हैं कि कोई और बच्चा ऐसी पीड़ा न झेले.

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