Photos: साल में केवल चैत्र नवरात्र पर ही खुलता है बिहार का यह मंदिर, वैष्णो देवी से भी कठिन है यहां पहुंचना...
Published by : ThakurShaktilochan Sandilya Updated At : 27 Mar 2025 12:57 PM
बिहार का मां कालिका धाम
Photos: बिहार में मां कालिका धाम की यात्रा वैष्णो देवी मंदिर की यात्रा से भी कठिन है. जहां जंगल, नदी, झरनों को पार करके श्रद्धालु पहुंचते हैं.
गणेश वर्मा, बेतिया: बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के रामनगर गोवर्धना क्षेत्र में स्थित सोमेश्वर पर्वत पर विराजमान मां कालिका धाम की यात्रा एक बार फिर श्रद्धालुओं के लिए खुलने वाली है. वीटीआर के जंगल, पहाड़, नदियां, झील, कंकरीली व दुर्गम रास्तों से होकर जाने वाली यह यात्रा मां वैष्णो देवी की यात्रा से कठिन है. लिहाजा पूरे साल के महज नौ दिन यानि चैत्र नवरात्रि में ही यहां यात्रा की अनुमति है, शेष दिनों में यहां मां का दर्शन संभव नहीं है. इस बार यह दुर्गम यात्रा 29 मार्च से शुरू हो रही है.
झील-झरनों को पार करते हुए मंदिर तक जाते हैं श्रद्धालु
खास यह है कि सोमेश्वर धाम तक पहुंचने के दौरान श्रद्धालु प्रकृति की खूबसूरती से भी रूबरू होते हैं. नदी, झील और झरनों को पार करते हुए भक्त मंदिर तक आते हैं. मां कालिका धाम पहुंचने से पहले श्रद्धालुओं को परेवा दह, दमदमवा पहाड़, भतृहरि कुटी, सोमेश्वर बंग्ला, महादेव मंदिर स्थल, रासोगुरू नौका, टाइटेनिक टीला इत्यादि पार करते हुए कठिन चढ़ाई करनी पड़ती है.

क्या है मंदिर की मान्यता, कैसे पहुंचेंगे?
मान्यता है यहां मां कालिका के कुपित रूप का दर्शन होता है. बता दें कि सोमेश्वर जाने के लिए लोगों को रामनगर आना पड़ता है. यहां से 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गोवर्धना जंगल से सोमेश्वर पहाड़ के लिए चढ़ाई शुरू होती है. जंगल में करीब 12 किलोमीटर दूरी तय करने के बाद लोग माता का दर्शन कर पाते हैं. इस यात्रा को पूरी करने में करीब 6 से 7 घंटे का समय लगता है.

बिहार के अलावे नेपाल, उत्तरप्रदेश से भी आते हैं श्रद्धालु
चैत्र नवरात्र के दौरान चलने वाली इस यात्रा में भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. बिहार के बेतिया, मोतिहारी, गोपालगंज, सीवान, छपरा समेत अन्य जिलों के अलावे उत्तरप्रदेश और नेपाल के भी श्रद्धालु यहां आते हैं. श्रद्धालुओं के लिए यहां पूरे नौ दिनों तक भंडारा चलता है. एसएसबी की ओर से मेडिसीन कैंप समेत अन्य सुविधाएं मुहैया कराई जाती है. स्थानीय लोग रास्ते में जलपान और पेयजल की व्यवस्था करते हैं.

एसएसबी और नेपाली एपीएफ का रहता है पहरा
पूरे नौ दिन तक चलने वाली इस यात्रा की सुरक्षा व्यवस्था एसएसबी के जिम्मे है. एसएसबी की एक टुकड़ी यहां कैंप करती है. जो श्रद्धालुओं और पूरे इलाके की सुरक्षा पर नजर रखते हैं. भारत-नेपाल सीमा होने की वजह से नेपाली एपीएफ यानि नेपाल सशस्त्र बल के जवान भी यहां मुस्तैद रहते हैं.

ब्रिटिश शासन में बना था बंग्ला
वैसे तो सोमेश्वर धाम कई सौ सालों तक लोगों की पहुंच से दूर रहा. ब्रिटिश शासन काल में शिकार करने के लिए अंग्रेज अफसर इस इलाके में आया करते थे. उन्होंने ही जंगल में पहाड़ी पर एक बंगला का निर्माण कराया था. अंग्रेज यही रात में रूकते थे. अब भी यहां बंग्ला स्थित है.
पर्यटन के रुप में होगा विकास: सांसद
सोमेश्वर को पर्यटन के रुप में विकसित करने की मांग की गई है. कठिन यात्रा को देखते हुए पर्यटन मंत्री को पत्र लिखकर यहां रोपवे या केबल कार की स्वीकृति देने का अनुरोध किया गया है. समुद्र तल से 2884 फीट ऊचें इस पहाड़ी से हिमालय की पर्वत श्रेणियों का भी दर्शन होता है. मां कालिका धाम, महादेव मंदिर, कुंड, भतृहरि मुनि की कुटियां यहां स्थित हैं.
सुनील कुमार, सांसद वाल्मीकिनगर
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By ThakurShaktilochan Sandilya
डिजिटल मीडिया का पत्रकार. प्रभात खबर डिजिटल की टीम में बिहार से जुड़ी खबरों पर काम करता हूं. प्रभात खबर में सफर की शुरुआत 2020 में हुई. कंटेंट राइटिंग और रिपोर्टिंग दोनों क्षेत्र में अपनी सेवा देता हूं.
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