थर्ड फ्रंट की मजबूती से भाजपा को लाभ नहीं
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :09 Oct 2015 2:16 AM (IST)
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राकांपा के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद तारिक अनवर का कहना है कि महागंठबंधन और एनडीए के खिलाफ थर्ड फ्रंट को रेस्पांस मिल रहा है. उन्होंने दावे के साथ कहा कि थर्ड फ्रंट की मजबूती से भाजपा को फायदा नहीं मिलेगा. उनसे बातचीतकी मिथिलेश ने… चुनाव हमारे लिए चुनौती कोई भी चुनाव टफ होता है. मैने […]
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राकांपा के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद तारिक अनवर का कहना है कि महागंठबंधन और एनडीए के खिलाफ थर्ड फ्रंट को रेस्पांस मिल रहा है. उन्होंने दावे के साथ कहा कि थर्ड फ्रंट की मजबूती से भाजपा को फायदा नहीं मिलेगा. उनसे बातचीतकी मिथिलेश ने…
चुनाव हमारे लिए चुनौती
कोई भी चुनाव टफ होता है. मैने इस चुनाव को चुनौती के रूप में लिया है. जिस तरह से रेस्पांस मिल रहा है, तीसरे मोरचे की ओर लोगों का रुझान दिख रहा, मैं काफी हद तक आशान्वित हूं. एक ओर महागंठबंधन है, वाम दल हैं. एनडीए भी है. शुरू में तो लड़ाई दो खेमों में ही दिख रही थी. मुख्य रूप से एनडीए और महागंठबंधन आमने-सामने था.
महागंठबंधन ने धोखा दिया
महागंठबंधन ने खुद ही अपना बना बनाया खेल बिगाड़ लिया. मुलायम सिंह यादव को मुखिया माना था. जनता परिवार का अध्यक्ष बनाये जाने की बात हुई थी. लेकिन, जब टिकट वितरण का समय आया तो औपचारिकता भी नहीं निभायी. यही मुलायम की नाराजगी का मुख्य कारण था. इन नेताओं को आपस में मिलाने में मुलायम की बड़ी भूमिका रही थी.
जब तक नीतीश कुमार को नेता माना, उन्होंने बहुत आदर- सम्मान दिया. और जैसे ही मुख्यमंत्री पद के लिए उनका नाम घोषित किया गया, उसके बाद वे पलट गये. हमारे साथ भी इसी तरह का व्यवहार हुआ. हम भी महागंठबंधन को अपना एक हिस्सा समझ रहे थे. लेकिन, एकाएक जदयू, राजद और कांग्रेस के लोगों को बुलाया गया और सौ-सौ सीटें बांट ली गयी. उनको लगता था कि हमारी कोई आवश्यकता थी ही नहीं.
राकांपा का मुख्य फोकस था कि सांप्रदायिकता को किस प्रकार रोका जाये. मुङो लगा कि शायद पहले ही शामिल होने का निर्णय गलत था. उसी समय थर्ड फ्रंट बनाने की जरूरत थी. मेरा मानना है कि नीतीश कुमार ने आज भी भाजपा से संबंध नहीं तोड़ा वह नरेंद्र मोदी के विरोधी हैं, भाजपा के नहीं. कल किसी कारणवश नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री का पद छोड़ दें तो और लालकृष्ण आडवाणी प्रधानमंत्री बन जायें, तो वह भाजपा से हाथ मिला सकते हैं.
थर्ड फ्रंट से भाजपा को मजबूती
नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है. आप यूपी को देखें, वहां भाजपा भी है. सपा भी है. बसपा व कांग्रेस भी है. चार मुख्य दल और छोटे- छोटे दल भी हैं. वहां कई सालों से भाजपा को रोक कर रखा गया है. 2014 के लोकसभा के चुनाव में बिहार में जदयू को दो और राजद को चार सीटें मिलीं.
एक सीट पर मैं भी जीता. हमारा यह कहना है कि आप बहुत ताकतवर हैं. लेकिन, सहयोगी को हैसियत के आधार पर तो सीटें देंगे ना. हम यह समझ कर चल रहे हैं कि महागंठबंधन जो है वह भाजपा को रोकने में सक्षम नहीं है.
चुनाव में जाति का समीकरण
पहले कहा विकास करेंगे अब जाति की तरफ जा रहे हैं. लालू प्रसाद ने खोल कर कह दिया अपर कास्ट और लोअर कास्ट के बीच लड़ाई है. डर लगने लगा कि चुनाव हार रहे हैं. मैंने भी राजनीति की है, लेकिन इन सबसे दूर रहा. हम भी ओवैसी बन सकते थे. लेकिन स्वतंत्रता सेनानी के परिवार से आते हैं. धर्म और समुदाय की राजनीति नहीं कर सकते.
जाति का मिथ तोड़ना चाहिए. जब तक इसके आगे नहीं चलेंगे, बिहार का भला नहीं होगा. हमलोगों का दुर्भाग्य यह है कि यहां धर्म और जातिवाद दोनों ही चरम पर है. एनडीए धर्म का सहारा ले रहा तो महागंठबंधन जाति का. जब लोग यह जान जाते हैं कि पूरा गणित जाति और धर्म है, तो लोग काम क्यों करेंगे. टिकट भी जाति के आधार पर बांटे जा रहे हैं.
परिणाम के बाद क्या करेंगे
यह तय है कि भाजपा के साथ किसी भी हाल में नहीं जायेंगे. रही बात महागंठबंधन की, तो जैसी परिस्थिति होगी, विचार करेंगे. हम एनडीए के साथ जाने के बजाये विपक्ष में बैठना पसंद करेंगे.
ओवैसी फैक्टर का असर
हमें नहीं लगता कि ओवैसी का यहां कोई जादू चल पायेगा. महाराष्ट्र में रेजेक्ट हो चुके हैं. वहां भी लगा था कि कहीं न कहीं स्पांसर्ड हैं, चल नहीं पाये. पहले कहा था कि यूपी जायेंगे. फिर कहा बिहार में सीमांचल के इलाके में उम्मीदवार खड़ा करेंगे. बिहार में उसी इलाके में आयेंगे, जहां मुसलिम अधिक हैं. पब्लिक परसेप्प्शन बन गया है. भाजपा और ओवेसी एक दूसरे के पूरक हैं.
ओवेसी बोलते हैं कि मुसलमानों के साथ नाइंसाफी हुइ है. मेरा मानना है कि किसी भी व्यक्ति के साथ नाइंसाफी हो सकती है. चाहे वह मुसलिम हो, दलित हो, महादलित हो या अगड़ी-पिछड़ी जाति से हो. मुसलमान अभी अलग जमात बना कर अपनी लड़ाई नहीं लड़ सकता. ओवेसी मुसलमानों की आवाज बनना चाहते हैं. इससे मुसलमान आइसोलेशन में चला जायेगा.
मुसलिम लीडरशिप नहीं उभरा
आजादी के बाद के दिनों में मौलाना अबुल कलाम आजाद, रफी अहमद किदवई जैसे नेता हुए. सेकुलर होते हुए भी मुसलमान इन पर विश्वास करता था. आज हम अपनी जुबान और भाषा बदल दें, तो हम भी ओवेसी और आजम खां बन सकते हैं. लेकिन इस तरह नहीं बोला जाना चाहिए, जिससे कि दूसरों को तकलीफ हो.
आजादी के बाद बार-बार आरएसएस मुसलमानों पर अटैक करता है कि तम्हारे कारण देश का बंटवारा हुआ. जो लोग मुसलमानों का उपयोग वोट बैंक की तरह करते हैं उन्हें भी भागीदारी देने में संकोच होता है. बिहार इसका उदाहरण है. माय समीकरण् में वाइ को तो मिल जा रहा लेकिन एम पीछे छूट जा रहा है. आप सीएम बनें तो कम-से-कम कम डिप्टी सीएम हमें भी तो बनायें. अब तक बिहार में सिर्फ अब्दुल गफूर ही एकमात्र मुसलिम सीएम हुए.
एनडीए हारा तो..
भाजपा का शासन आठ साल रहा है. दो बार यहां से भाजपा जीती. भाजपा की सरकार बन जायेगी तो भूचाल आ जायेगा, ऐसा महागंठबंधन ने प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया है. क्या 2005 और 2010 में नहीं यह सवाल था. बिहार में भाजपा हारी तो केंद्र सरकार की उलटी गिनती शुरू होगी, ऐसा मैं नहीं मानता.
यह राज्य का चुनाव है. किसी एक राज्य का चुनाव हार जाने से केंद्र की सेहत पर कोई असर पड़ता. महागंठबंधन हारता है तो इसका असर नीतीश कुमार की सेहत पर पड़ेगा. सिर्फ चुनाव जीतने के लिए दोनों ओर से कोशिशें हो रही है. चुनाव हारने पर जदयू का अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा. मोटे तौर पर लालू प्रसाद को फायदा हो सकता है.
चुनाव बाद कैसी सरकार
कैसी लीडरशिप आती है इस पर निर्भर करता है. शक्ल सूरत के साथ इच्छा शक्ति भी जरूरी है. ऐसा कोई सीएम बन जाये, जो अपनी गद्दी बचाने में लगे रहे, तो बिहार को क्या फायदा मिलेगा?
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